ہم لڑکے ہیں آج آپ کو سب سچ سچ بتاتے ہیں ہم کہ سے لیے اتنا مسکراتے ہیں ہم کو رونا بھی آئی تو کہاں رو پاتے ہیں کوئی دیکھ نہ لے روتا ہوا یہ سوچ کر ڈر جاتے ہیں درد سہتے ہیں اور اپنے آنسوؤں کو پی جاتے ہیں ہم حقیقت ہیں جنہیں اپنے اشک بہانے سے روکا جاتا ہے جنہیں اپنا درد سنہانے سے روکا جاتا ہے ہم حقیقت ہیں جو خود ہی خود کا مزاق بناتے ہیں اور پھروں ایک دوجے سے سچ چھپاتے ہیں ہم سب کچھ کر سکتے ہیں مگر کبھی کھل کر رو نہیں سکتے ہمارا درد ہمارے سوا ای سے دنیا ہے وہ ہے وہ کہاں کوئی سمجھ پاتا ہے سکھ ہے وہ ہے وہ کھل کے ہنستے ہیں اور دکھ ہے وہ ہے وہ جھوٹ موٹھ کا مسکرانا آتا ہے ہم لڑکے ہیں صاحب ہمیں بچپن سے بس یہی سکھایا گیا تو ہے لڑکے روتے نہیں ہیں یہ بول بول کر پتھر دل بنایا گیا تو ہے اپنے من کی کرنے والا ای سے سماج کی نظر ہے وہ ہے وہ ہر لڑکا برا ہے اپنے آنسوؤں کو پی جاؤ دوستوں ہم لڑکے ہیں ہمیں رونا منا ہے
Related Nazm
ا سے سے محبت جھیلیں کیا ہیں ا سے کی آنکھیں عمدہ کیا ہے ا سے کا چہرہ خوشبو کیا ہے ا سے کی سانسیں خوشیاں کیا ہیں ا سے کا ہونا تو غم کیا ہے ا سے سے جدائی ساون کیا ہے ا سے کا رونا سر گرا کیا ہے ا سے کی اداسی گرمی کیا ہے ا سے کا غصہ اور بہاریں ا سے کا ہنسنا میٹھا کیا ہے ا سے کی باتیں کڑوا کیا ہے مری باتیں کیا پڑھنا ہے ا سے کا لکھا کیا سننا ہے ا سے کی غزلیں لب کی خواہش ا سے کا ماتھا زخم کی خواہش ا سے کا چھونا دنیا کیا ہے اک جنگل ہے اور جاناں کیا ہوں پیڑ سمجھ لو اور حقیقت کیا ہے اک راہی ہے کیا سوچا ہے ا سے سے محبت کیا کرتے ہوں ا سے سے محبت زار پیشہ ا سے سے محبت ا سے کے علاوہ ا سے سے محبت ا سے سے محبت
Varun Anand
475 likes
"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
236 likes
ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں ہے وہ ہے وہ ہر کام کرنے ہے وہ ہے وہ ہے وہ ضروری بات کہنی ہوں کوئی وعدہ نبھانا ہوں اسے آواز دینی ہوں اسے واپ سے بلانا ہوں ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ مدد کرنی ہوں ا سے کی یار کی ڈھار سے باندھنا ہوں بے حد دیری لگ رستوں پر کسی سے ملنے جانا ہوں ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ بدلتے موسموں کی سیر ہے وہ ہے وہ دل کو لگانا ہوں کسی کو یاد رکھنا ہوں کسی کو بھول جانا ہوں ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ کسی کو موت سے پہلے کسی غم سے بچانا ہوں حقیقت اور تھی کچھ ا سے کو جا کے یہ بتانا ہوں ہمیشہ دیر کر دیتا ہوں ہے وہ ہے وہ ہر کام کرنے ہے وہ ہے وہ
Muneer Niyazi
108 likes
تو کسی اور ہی دنیا ہے وہ ہے وہ ملی تھی مجھ سے تو کسی اور ہی موسم کی مہک لائی تھی ڈر رہا تھا کہ کہی زخم لگ بھر جائیں مری اور تو مٹھیاں بھر بھر کے نمک لائی تھی اور ہی طرح کی آنکھیں تھی تری چہرے پر تو کسی اور ستارے تم سے چمک لائی تھی تیری آواز ہی سب کچھ تھی مجھے مون سے جاں کیا کروں ہے وہ ہے وہ کہ تو بولی ہی بے حد کم مجھ سے تیری چپ سے ہی یہی محسو سے کیا تھا ہے وہ ہے وہ نے جیت جائےگا تیرا غم کسی روز مجھ سے شہر آوازیں لگاتا تھا م گر تو چپ تھی یہ تعلق مجھے تقاضا تھا م گر تو چپ تھی وہی انجام تھا جو عشق کا آغاز سے ہے تجھ کو پایا بھی نہیں تھا کہ تجھے کھونا تھا چلی آتی ہے یہی رسم کئی صدیوں سے یہی ہوتا ہے یہی ہوگا یہی ہونا تھا پوچھتا رہتا تھا تجھ سے کہ بتا کیا دکھ ہے اور مری آنکھ ہے وہ ہے وہ آنسو بھی نہیں ہوتے تھے ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے اندازے لگائے کے سبب کیا ہوگا پر مری تیر ترازو بھی نہیں ہوتے تھے جس کا ڈر تھا مجھے معلوم پڑا لوگوں سے پھروں حقیقت خوش بخت پلٹ آیا تیری دنیا ہے وہ ہے وہ ہے وہ ج سے کے جانے پہ مجھے تو نے جگہ دی دل ہے
Tehzeeb Hafi
180 likes
राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
73 likes
Similar Writers
Our suggestions based on ABhishek Parashar.
Similar Moods
More moods that pair well with ABhishek Parashar's nazm.







