Search
“Insaan” ke results
Sher
पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँँ करें हम
Jaun Elia
आदमी देश छोड़े तो छोड़े 'अली' दिल में बसता हुआ घर नहीं छोड़ता एक मैं हूँ कि नींदें नहीं आ रही एक तू है कि बिस्तर नहीं छोड़ता
Ali Zaryoun
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर आदत इस की भी आदमी सी है
Gulzar
वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
जो मेरे साथ मोहब्बत में हुई आदमी एक दफा सोचेगा रात इस डर में गुजारी हम ने कोई देखेगा तो क्या सोचेगा
Tehzeeb Hafi
इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के
Mirza Ghalib
है दुख तो कह दो किसी पेड़ से परिंदे से अब आदमी का भरोसा नहीं है प्यारे कोई
Madan Mohan Danish
इंसान अपने आप में मजबूर है बहुत कोई नहीं है बे-वफ़ा अफ़्सोस मत करो
Bashir Badr
तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
Sahir Ludhianvi
सुब्ह-ए-मग़रूर को वो शाम भी कर देता है शोहरतें छीन के गुमनाम भी कर देता है वक़्त से आँख मिलाने की हिमाकत न करो वक़्त इंसान को नीलाम भी कर देता है
Nadeem Farrukh
Nazm
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए म
Afkar Alvi
"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार
Yasra rizvi
मोहब्बत ख़ुद अपने लिए जिस्म चुनती है और जाल बुनती है उन के लिए जो ये आग अपने सीनों में भरने को तय्यार हों घुट के जीने से बेज़ार हों मोहब्बत कभी एक से या कभी एक सौ एक लोगों से होने का ऐलान एक सा
Tehzeeb Hafi
इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है इस के साए में सदा प्यार के चर्चे होंगे ख़त्म जो हो न सकेगी वो कहानी दी है इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल ताज वो
Shakeel Badayuni
ये वक़्त क्या है ये वक़्त क्या है ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था तब कहाँ था कहीं तो होगा गुज़र गया है तो अब कहाँ है कहीं तो होगा कहाँ से आया किधर गया ह
Javed Akhtar
"तुम्हारी औक़ात क्या है पीयूष मिश्रा" सब कुछ तो है फिर भी क्या है होकर भी जो ना होता अचरज करता ये मिज़ाज मैं ना भी होता क्या होता नद्दी नाले बरखा बादल वैसे के वैसे रहते पर फिर भी जो ना
Piyush Mishra
ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्ते कि बख़्शा गया जिन को ज़ौक़-ए-गदाई ज़माने की फटकार सरमाया इन का जहाँ भर की धुत्कार इन की कमाई न आराम शब को न राहत सवेरे ग़लाज़त में घर नालियों में बसेरे जो बिगड़ें
Faiz Ahmad Faiz
नज़्म - बेबसी तेरे साथ गुज़रे दिनों की कोई एक धुँदली सी तस्वीर जब भी कभी सामने आएगी तो हमें एक दुआ थामने आएगी, बुढ़ापे की गहराइयों में उतरते हुए तेरी बे-लौस बाँहों के घेरे नहीं भूल पाएँगे
Tehzeeb Hafi
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें कि औरों के
Sahir Ludhianvi
सुब्हें रौशन थी और गर्मियों की थका देने वाले दिनों में सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नहरों में गोते लगाते अपने चेहरों से कीचड़ लगाकर डराते थे एक दूसरे को किनारों पर बैठे हुए हम ने जो
Tehzeeb Hafi
Ghazal
मत बुरा उस को कहो गरचे वो अच्छा भी नहीं वो न होता तो ग़ज़ल मैं कभी कहता भी नहीं जानता था कि सितमगर है मगर क्या कीजे दिल लगाने के लिए और कोई था भी नहीं जैसा बे-दर्द हो वो फिर भी ये जैसा महबूब ऐसा
Kaleem Aajiz
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में
Ahmad Faraz
जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर
Tehzeeb Hafi
उसे भी साथ रखता, और तुझे भी अपना बना लेता अगर मैं चाहता, तो दिल में कोई चोर दरवाज़ा बना लेता ख़्वाब मिलाएगा कर के ख़ुश हूँ, पर ये पछतावा नहीं जाता के मुस्तक़बिल बनाने से तो अच्छा था, तुझे अपना बना
Tehzeeb Hafi
ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिले सफे आवारगी नहीं लगता कभी-कभी वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी-कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहाँ से तु
Tehzeeb Hafi
मैं बुरा हूँ और हूँ मजबूऱ आदत के लिए दूर रहिए आप भी अपनी शराफत के लिए है अगर मुझ सेे गिला तो आज़मा के देख ले तू कहे तो जान हाज़िर है मुहब्बत के लिए तेरे आगे ख़ूब-सूरत चाँद भी फीका पड़े और क्य
Prashant Sitapuri
झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे ऐसा माहौल जहाँ
Umair Najmi
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता किसी भी आइने में देर तक चेहरा नहीं रहता बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता हज़ारों शे'र मेरे सो गए का
Bashir Badr
सर ही अब फोड़िए नदामत में नींद आने लगी है फ़ुर्क़त में हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर सोचता हूँ तिरी हिमायत में रूह ने इश्क़ का फ़रेब दिया जिस्म को जिस्म की अदावत में अब फ़क़त आदतों की वर्ज़िश है रूह शाम
Jaun Elia
उस ने दो चार कर दिया मुझ को ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझ को क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे क्यूँ तलबगार कर दिया मुझ को कभी पत्थर कभी ख़ुदा उस ने चाहा जो यार कर दिया मुझ को उस सेे कोई सवाल मत करना उस ने
Himanshi babra KATIB