nae kapde badal kar jaun kahan aur baal banaun kis ke liye vo shakhs to shahr hi chhod gaya main bahar jaun kis ke liye आज नासिर काज़मी के इस हसीन शे’र की व्याख्या करते हैं। नासिर काज़मी ने शायरी में जिस कल्पना और जिस शब्द-क्रम का अनोखा मिश्रण किया है वो दिल पर असर करने की हर तरह की सलाहियत रखती है। नासिर काज़मी ने इस शे’र में निहायत आसान शब्दों में फ़िराक़-ए-यार का अफ़साना सुना दिया है। वो यार वो महबूब जो हर वक़्त उनके होश-हवास पर हावी है और जो एक लम्हे के लिए भी उनके ज़ेहन व दिमाग़ से नहीं उतरा है। महबूब से मुलाक़ात को इस शे’र में एक ऐसे उत्सव की तरह बयान किया गया है जिसके लिए नए लिबास का चुनाव और लिबास के साथ साथ चेहरे के शृंगार का ख़ास ख़्याल रखा जाता है। अपने महबूब से मुलाक़ात के लिए जिस ख़ुश-दिली के साथ शायर ख़ुद को तैयार करता है वही ख़ुश-दिली निराशा और उदासी में बदल जाती है, जब शायर का महबूब ग़ैर मौजूद होता है। ये शे’र जुदाई का फ़साना तो सुनाता ही है, निराशा का एक ऐसा दृश्य भी पेश करता है जिसके प्रभाव से सुनने वाले या पढ़ने वाले भी दुखी हो जाते हैं। ज़ाहिर है कि जिस घड़ी शायर का महबूब शहर में मौजूद था और शायर की मुलाक़ात हुआ करती थी उस ख़ुशी का क्या ठिकाना हो सकता है मगर अफ़सोस बहुत अफ़सोस जब उसका महबूब शहर छोड़कर चला गया और उसके जाने के साथ शायर के लिए शहर की तमाम रौनक़ें ख़त्म हो गईं, शहर का आलम ही बदल गया, शहर का रंग बे रंगी में तबदील हो गया। शायर इतना दुखी और उदास है कि उसका जी बाहर निकलने को चाह रहा है और न ही अपने लिबास और अपने बालों की साज–सज्जा की तरफ़ मुतवज्जा होने को। ये परिदृश्य इतना हक़ीक़ी है कि हम भी जैसे इस पीड़ा और इस तकलीफ़ को ख़ुद अपने दिल में महसूस कर सकते हैं। बारहा हम भी कहीं न कहीं इस तकलीफ़ से गुज़रे ज़रूर हैं। हम महसूस करते हैं कि जहाँ-जहाँ हम अपने दोस्त और अपने महबूब के साथ घूमते रहे हैं, जिन पार्कों और रेस्तोरानों में वक़्त गुज़ारी की है वो सब अचानक बे रंग और बे रूह लगने लगते हैं जब हमारा दोस्त और हमारा यार हमसे बिछड़ जाता है या वक़्ती तौर पर हमसे दूर चला जाता है। एक और अहम बात जो इस शे’र को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि शायर ने जिन शब्दों चयन किया है वो इतने आसान हैं कि जिसने शे’र के ऊपरी हुस्न को ग़ैर मामूली तौर पर दमका दिया है। ये दमक इतनी तेज़ है कि इसके पीछे कर्बनाक मंज़र की जो सेरबीन चल रही है उसे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। अगर सुननेवाला या पढ़नेवाला इस बेचैनी तक पहुंच जाता है तो इस शे’र का हक़ अदा होजाता है। अपने महबूब के बिना शहर से गुज़रने का ख़्याल ही बहुत जान लेवा है। जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को रूहाँसा कर सकता है। इसी ख़्याल को डाक्टर बशीर बद्र इस तरह बयान करते हैं: उन्ही रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे मुझे रोक रोक पूछा तेरा हमसफर कहाँ है नासिर काज़मी ने दर्द व ग़म, कर्ब व बेचैनी को जिस आसान अंदाज़ में बयान कर सांसारिक रंग दिया है इसकी मिसाल विरल ही मिलती है। sohail azad
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maine jo kuchh bhi socha hua hai main vo vaqt aane pe kar jaaunga tum mujhe zahar lagte ho aur main kisi din tumhein pee ke mar jaaunga
Tehzeeb Hafi
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bharam rakha hai tere hijr ka varna kya hota hai main rone pe aa jaaun to jharna kya hota hai meraa chhodo main nain thakta meraa kaam yahii hai lekin tumne itne pyaar ka karna kya hota hai
Tehzeeb Hafi
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sakhiyon sang rangne ki dhamki sunkar kya dar jaaunga teri gali men kya hogaa ye maaloom hai par aaunga
Kumar Vishwas
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uljh karke teri agar men yuñ aabaad ho jaaun ki jaise lucknow ka main ameenabad ho jaaun main yamuna ki tarah tanhaa nihaaru taaj ko kab tak koi ganga mile to main ilahaabad ho jaaun
Ashraf Jahangeer
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kahaan ki dosti kin doston ki baat karte ho miyaan koi dushman nahin milta ab to thikaane ka
Waseem Barelvi
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bas yuñ hi dil ko tavakko sii hai tujh se warna jaanta hooñ ki muqaddar hai mera tanhaaii
Nasir Kazmi
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judaaiyon ke zaKHm dard-e-zindagi ne bhar diye tujhe bhi neend aa gaii mujhe bhi sabr aa gaya
Nasir Kazmi
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Din bhar to main duniya ke dhandon me khoya raha
Nasir Kazmi
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kaun achha hai is zamaane men kyun kisi ko bura kahe koii
Nasir Kazmi
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is se pahle ki bichhad jaayen ham do-qadam aur mire saath chalo mujh sa phir koi na aayega yahaañ rok lo mujh ko agar rok sako
Nasir Kazmi
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