अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो मुझ से बिखरे हुए गेसू नहीं देखे जाते सुर्ख़ आँखों की क़सम काँपती पलकों की क़सम थरथराते हुए आँसू नहीं देखे जाते अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो छूट जाने दो जो दामान-ए-वफ़ा छूट गया क्यूँँ ये लग़्ज़िदा-ख़िरामी पे पशीमाँ-नज़री तुम ने तोड़ा तो नहीं रिश्ता-ए-दिल टूट गया अब तुम आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी आया न करो मेरी आहों से ये रुख़्सार न कुम्हला जाएँ ढूँडती होगी तुम्हें रस में नहाई हुई रात जाओ कलियाँ न कहीं सेज की मुरझा जाएँ
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مجھ کو اتنے سے کام پہ رکھ لو جب بھی سینے ہے وہ ہے وہ جھولتا لاکٹ الٹا ہوں جائے تو ہے وہ ہے وہ ہاتھوں سے سیدھا کرتا رہوں اس کا کو جب بھی آویزہ الجھ بالوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ مسکرا کے بس اتنا سا کہ دو آہ چبھتا ہے یہ الگ کر دو جب غرارے ہے وہ ہے وہ پاؤں قبلہ حاجات جائے یا دوپٹہ کسی کواڑ سے اٹکے اک نظر دیکھ لو تو کافی ہے پلیز کہ دو تو اچھا ہے لیکن مسکرانے کی شرط پکی ہے مسکراہٹ معاوضہ ہے میرا مجھ کو اتنے سے کام پہ رکھ لو
Gulzar
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ا سے سے محبت جھیلیں کیا ہیں ا سے کی آنکھیں عمدہ کیا ہے ا سے کا چہرہ خوشبو کیا ہے ا سے کی سانسیں خوشیاں کیا ہیں ا سے کا ہونا تو غم کیا ہے ا سے سے جدائی ساون کیا ہے ا سے کا رونا سر گرا کیا ہے ا سے کی اداسی گرمی کیا ہے ا سے کا غصہ اور بہاریں ا سے کا ہنسنا میٹھا کیا ہے ا سے کی باتیں کڑوا کیا ہے مری باتیں کیا پڑھنا ہے ا سے کا لکھا کیا سننا ہے ا سے کی غزلیں لب کی خواہش ا سے کا ماتھا زخم کی خواہش ا سے کا چھونا دنیا کیا ہے اک جنگل ہے اور جاناں کیا ہوں پیڑ سمجھ لو اور حقیقت کیا ہے اک راہی ہے کیا سوچا ہے ا سے سے محبت کیا کرتے ہوں ا سے سے محبت زار پیشہ ا سے سے محبت ا سے کے علاوہ ا سے سے محبت ا سے سے محبت
Varun Anand
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محبوبہ کے نام تو اپنی چٹھیوں ہے وہ ہے وہ میر کے اشعار لکھتی ہے محبت کے بنا ہے زندگی بیکار لکھتی ہے تیرے خط تو عبارت ہیں وفاداری کی قسموں سے جنہیں ہے وہ ہے وہ پیسہ ڈرتا ہوں وہی ہر بار لکھتی ہے تو پیروکار لیلیٰ کی ہے شیریں کی پجارن ہے مگر تو جس پہ بیٹھی ہے حقیقت سونے کا سنگھاسن ہے تیری پلکوں کے مسکارے تیرے ہونٹوں کی یہ لالی یہ تیرے ریشمی کپڑے یہ تیرے کان کی بالی گلے کا یہ چمکتا ہار ہاتھوں کے تیرے کنگن یہ سب کے سب ہے میرے دل میرے احساس کے دشمن کہ ان کے سامنے کچھ بھی نہیں ہے پیار کی قیمت وفا کا مول کیا کیا ہے اعتبار کی قیمت شکستہ کشتیوں ٹوٹی ہوئی پتوار کی قیمت ہے میری جیت سے بڑھکر تو تیری ہار کی قیمت حقیقت خون کے آنسو تجھے جنگل پرستی جاناں تو اپنے فیصلے پر بعد ہے وہ ہے وہ پچھتائےگی جاناں میرے کندھے پہ چھوٹے بھائیوں کی ذمہ داری ہے میرے ماں باپ بوڑھے ہے بہن بھی تو کنواری ہے برہنہ موسموں کے وار کو تو سہ نہ بدلی حویلی چھوڑ کر تو جھونپڑی ہے وہ ہے وہ رہ نہ بدلی بیگانہ غم تیری میری مفلسی کو
Abrar Kashif
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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نقوش حسرت مٹا کے اٹھنا خوشی کا پرچم ق سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ کے اٹھنا ملا کے سر بیٹھنا مبارک ترا لگ فتح گا کے اٹھنا یہ گفتگو گفتگو نہیں ہے بگڑنے بننے کا مرحلہ ہے دھڑک رہا ہے فضا کا سینا کہ زندگی کا معاملہ ہے اڑائے رہے یا بہار آئی تمہارے ہاتھوں ہے وہ ہے وہ فیصلہ ہے لگ چین بے تاب بجلیوں کو لگ مطمئن کاروان شبنم کبھی شگوفوں کے گرم تیور کبھی گلوں کا مزاج برہم شگوفہ و گل کے ا سے تصادم ہے وہ ہے وہ گلستاں بن گیا تو جہنم سجا لیں سب اپنی اپنی جنت اب ایسے خاکے بنا کے اٹھنا خزا لگ رنگ و نور تاریک رہگزاروں ہے وہ ہے وہ لٹ رہا ہے عرو سے گل کا غرور عصمت سیاہکاروں ہے وہ ہے وہ لٹ رہا ہے تمام سرمایہ لطافت ذلیل خارو ہے وہ ہے وہ لٹ رہا ہے گھٹی گھٹی ہیں نمو کی سانسیں چھوٹی چھوٹی نبض گلستاں ہے ہیں گرسنا پھول تشنہ لبی غنچے رخوں پہ زر گرا لبوں پہ جاں ہے ہم نوا ہیں ہم سفیر جب سے اڑائے چمن ہے وہ ہے وہ رواں دواں ہے ا سے انتشار چمن کی سوگند باب زنداں ہلا کے اٹھنا حیات گیتی کی آج جستجو دل شکستہ ہوئی نگاہیں ہیں انقلابی پیام عشق سے کرنیں اتر رہی ہیں
Kaifi Azmi
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اے ہمہ رنگ ہمہ نور ہمہ سوز و گداز بزم مہتاب سے آنے کی ضرورت کیا تھی تو ج ہاں تھی اسی جنت ہے وہ ہے وہ نکھرتا ترا روپ ا سے جہنم کو بسانے کی ضرورت کیا تھی یہ خد و خال یہ خوابوں سے تراشا ہوا جسم اور دل ج سے پہ خد و خال کی دل پسند بھی نثار بچھاؤ ہی بچھاؤ شرارے ہی شرارے ہیں ی ہاں اور تھم تھم کے اٹھا پاؤں بہاروں کی بہار تشنہ لبی زہر بھی پی جاتی ہے امرت کی طرح جانے ک سے جام پہ رک جائے نگاہ معصوم ڈوبتے دیکھا ہے جن آنکھوں ہے وہ ہے وہ مے خا لگ بھی پیا سے ان آنکھوں کی بجھے یا لگ بجھے کیا معلوم ہیں سبھی حسن پرست اہل نظر صاحب دل کوئی گھر ہے وہ ہے وہ کوئی محفل ہے وہ ہے وہ سجائے گا تجھے تو فقط جسم نہیں شعر بھی ہے گیت بھی ہے کون اشکوں کی گھنی چھاؤں ہے وہ ہے وہ گائے گا تجھے تجھ سے اک درد کا رشتہ بھی ہے ب سے پیار نہیں اپنے آنچل پہ مجھے خوشی بہا لینے دے تو ج ہاں جاتی ہے جا روکنے والا ہے وہ ہے وہ کون اپنے رستے ہے وہ ہے وہ م گر شمع جلا لینے دے
Kaifi Azmi
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کبھی جمود کبھی صرف انتشار سا ہے ج ہاں کو اپنی تباہی کا انتظار سا ہے منہو کی مچھلی لگ کشتی نوح اور یہ فضا کہ قطرے قطرے ہے وہ ہے وہ طوفان بے قرار سا ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ ک سے کو اپنے گریباں کا چاک دکھلاؤں کہ آج دامن یزداں بھی تار تار سا ہے سجا سنوار کے ج سے کو ہزار ناز کیے اسی پہ خالق کونین شرمسار سا ہے تمام جسم ہے منجملہ و اسباب ماتم فکر خوابیدہ دماغ پچھلے زمانے کی یادگار سا ہے سب اپنے پاؤں پہ رکھ رکھ کے پاؤں چلتے ہیں خود اپنے دوش پہ ہر آدمی سوار سا ہے جسے پکاریے ملتا ہے اک کھنڈر سے جواب جسے بھی دیکھیے ماضی کا اشتہار سا ہے ہوئی تو کیسے شایاں ہے وہ ہے وہ آ کے شام ہوئی کہ جو مزار ی ہاں ہے میرا مزار سا ہے کوئی تو سود چکائے کوئی تو ذمہ لے ا سے انقلاب کا جو آج تک ادھار سا ہے
Kaifi Azmi
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कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँँ है वो जो अपना था वही और किसी का क्यूँँ है यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँँ है यही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँँ है इक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामन उन के सीने में समा जाए हमारी धड़कन इतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यूँँ है दिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोई इस लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोई आस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूँँ है तुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ता कहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ता है जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँँ है
Kaifi Azmi
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लो पौ फटी वो छुप गई तारों की अंजुमन लो जाम-ए-महरस वो छलकने लगी किरन खिचने लगा निगाह में फ़ितरत का बाँकपन जल्वे ज़मीं पे बरसे ज़मीं बन गई दुल्हन गूँजे तराने सुब्ह का इक शोर हो गया आलम मय-ए-बक़ा में शराबोर हो गया फूली शफ़क़ फ़ज़ा में हिना तिलमिला गई इक मौज-ए-रंग काँप के आलम पे छा गई कुल चाँदनी सिमट के गुलों में समा गई ज़र्रे बने नुजूम ज़मीं जगमगा गई छोड़ा सहर ने तीरगी-ए-शब को काट के उड़ने लगी हवा में किरन ओस चाट के मचली जबीन-ए-शर्क़ पे इस तरह मौज-ए-नूर लहरा के तैरने लगी आलम में बर्क़-ए-तूर उड़ने लगी शमीम छलकने लगा सुरूर खिलने लगे शगूफ़े चहकने लगे तुयूर झोंके चले हवा के शजर झूमने लगे मस्ती में फूल काँटों का मुँह चूमने लगे थम थम के ज़ौ-फ़िशाँ हुआ ज़र्रों पे आफ़्ताब छिड़का हवा ने सब्ज़ा-ए-ख़्वाबीदा पर गुलाब मुरझाई पत्तियों में मचलने लगा शबाब लर्ज़िश हुई गुलों को बरसने लगी शराब रिंदान-ए-मस्त और भी सरमस्त हो गए थर्रा के होंट जाम में पैवस्त हो गए दोशीज़ा एक ख़ुश-क़द ओ ख़ुश-रंग-ओ-ख़ूब-रू मालन की नूर-दीदा गुलिस्ताँ की आबरू महका रही है फूलों से दामान-ए-आरज़ू तिफ़्ली लिए है गोद में तूफ़ान-ए-रंग-ओ-बू रंगीनियों में खेली गुलों में पली हुई नौरस कली में क़ौस-ए-क़ुज़ह है ढली हुई मस्ती में रुख़ पे बाल परेशाँ किए हुए बादल में शम-ए-तूर फ़रोज़ाँ किए हुए हर सम्त नक़्श-ए-पास चराग़ाँ किए हुए आँचल को बार-ए-गुल से गुलिस्ताँ किए हुए लहरा रही है बाद-ए-सहर पाँव चूम के फिरती है तीतरी सी ग़ज़ब झूम झूम के ज़ुल्फ़ों में ताब-ए-सुम्बुल-ए-पेचाँ लिए हुए आरिज़ में शोख़ रंग-ए-गुलिस्ताँ लिए हुए आँखों में रूह-ए-बादा-ए-इरफ़ाँ लिए हुए होंटों में आब-ए-लाल-ए-बदख़्शाँ लिए हुए फ़ितरत ने तोल तोल के चश्म-ए-क़ुबूल में सारा चमन निचोड़ दिया एक फूल में ऐ हूर-ए-बाग़ इतनी ख़ुदी से न काम ले उड़ कर शमीम-ए-गुल कहीं आँचल न थाम ले कलियों का ले पयाम सहर का सलाम ले 'कैफ़ी' से हुस्न-ए-दोस्त का ताज़ा कलाम ले शाएर का दिल है मुफ़्त में क्यूँँ दर्द-मंद हो इक गुल इधर भी नज़्म अगर ये पसंद हो
Kaifi Azmi
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