محبوبہ کے نام تو اپنی چٹھیوں ہے وہ ہے وہ میر کے اشعار لکھتی ہے محبت کے بنا ہے زندگی بیکار لکھتی ہے تیرے خط تو عبارت ہیں وفاداری کی قسموں سے جنہیں ہے وہ ہے وہ پیسہ ڈرتا ہوں وہی ہر بار لکھتی ہے تو پیروکار لیلیٰ کی ہے شیریں کی پجارن ہے مگر تو جس پہ بیٹھی ہے حقیقت سونے کا سنگھاسن ہے تیری پلکوں کے مسکارے تیرے ہونٹوں کی یہ لالی یہ تیرے ریشمی کپڑے یہ تیرے کان کی بالی گلے کا یہ چمکتا ہار ہاتھوں کے تیرے کنگن یہ سب کے سب ہے میرے دل میرے احساس کے دشمن کہ ان کے سامنے کچھ بھی نہیں ہے پیار کی قیمت وفا کا مول کیا کیا ہے اعتبار کی قیمت شکستہ کشتیوں ٹوٹی ہوئی پتوار کی قیمت ہے میری جیت سے بڑھکر تو تیری ہار کی قیمت حقیقت خون کے آنسو تجھے جنگل پرستی جاناں تو اپنے فیصلے پر بعد ہے وہ ہے وہ پچھتائےگی جاناں میرے کندھے پہ چھوٹے بھائیوں کی ذمہ داری ہے میرے ماں باپ بوڑھے ہے بہن بھی تو کنواری ہے برہنہ موسموں کے وار کو تو سہ نہ بدلی حویلی چھوڑ کر تو جھونپڑی ہے وہ ہے وہ رہ نہ بدلی بیگانہ غم تیری میری مفلسی کو
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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تمہیں اک بات کہنی تھی اجازت ہوں تو کہ دوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ یہ بھیگا بھیگا سا موسم یہ تتلی پھول اور شبنم چمکتے چاند کی باتیں یہ بوندیں اور برساتیں یہ کالی رات کا آنچل ہوا ہے وہ ہے وہ ناچتے بادل دھڑکتے موسموں کا دل مہکتی سرسرا کا دل یہ سب جتنے نظارے ہیں کہو ک سے کے اشارے ہیں سبھی باتیں سنی جاناں نے پھروں آنکھیں پھیر لیں جاناں نے ہے وہ ہے وہ ہے وہ تب جا کر کہی سمجھا کہ جاناں نے کچھ نہیں سمجھا ہے وہ ہے وہ ہے وہ قصہ بڑھوا کر کے ذرا نیچی نظر کر کے یہ کہتا ہوں ابھی جاناں سے محبت ہوں گئی جاناں سے
Zubair Ali Tabish
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا
Jaun Elia
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مجھ کو اتنے سے کام پہ رکھ لو جب بھی سینے ہے وہ ہے وہ جھولتا لاکٹ الٹا ہوں جائے تو ہے وہ ہے وہ ہاتھوں سے سیدھا کرتا رہوں اس کا کو جب بھی آویزہ الجھ بالوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ مسکرا کے بس اتنا سا کہ دو آہ چبھتا ہے یہ الگ کر دو جب غرارے ہے وہ ہے وہ پاؤں قبلہ حاجات جائے یا دوپٹہ کسی کواڑ سے اٹکے اک نظر دیکھ لو تو کافی ہے پلیز کہ دو تو اچھا ہے لیکن مسکرانے کی شرط پکی ہے مسکراہٹ معاوضہ ہے میرا مجھ کو اتنے سے کام پہ رکھ لو
Gulzar
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