nazmKuch Alfaaz

اظہار زندگی تری سوا سوچوں خوشگوار ہے مجھے حاصل کن کی قسم تیری ہی چاہت ہے مجھے ساتھ اک عمر گزاری ہے م گر تو ہی بتا جان جاں کیسے بتاؤں کے محبت ہے مجھے تری سائے ہے وہ ہے وہ مری جان رہا کرتے ہیں تب کہی جا کے ی ہاں پھول کھلا کرتے ہیں تو جو انگڑائی بھی لے لے تو فضا بہکے ہے تیری پلکوں پہ یہ مہتاب ہوا کرتے ہیں گر نظر بھر کے تجھے دیکھ لے دنیا والے جان من تیری ہی یادوں ہے وہ ہے وہ زیا کرتے ہیں تیرا ہی نام لیے جانے کی عادت ہے مجھے جان جاں کیسے بتاؤں کے محبت ہے مجھے تری زلفوں کی ہنسی چھاؤں تلے بیٹھا ہوں تیری خوشبو سے ہے وہ ہے وہ تصویر بنا لیتا ہوں تیری پائل کی خنک کفر کی چابی ہے مری قسمت تری سائے ہے وہ ہے وہ زیا کرتا ہوں تو ا گر ساتھ رہے دامن گلشن کے لیے ہونٹ شبنم سے لگا کر ہے وہ ہے وہ پلا سکتا ہوں تو گماں کر لے جو حقیقت بات حقیقت ہے مجھے جان جاں کیسے بتاؤں کے محبت ہے مجھے سمے پھولوں کا نگہبان بنا بیٹھا تھا ہے وہ ہے وہ ہے وہ بھی گلشن سے ہواؤں کی طرح گزرا تھا تیری مسکان کے صدقے ہی مری دنیا تھی تری ہونٹوں

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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تو کسی اور ہی دنیا ہے وہ ہے وہ ملی تھی مجھ سے تو کسی اور ہی موسم کی مہک لائی تھی ڈر رہا تھا کہ کہی زخم لگ بھر جائیں مری اور تو مٹھیاں بھر بھر کے نمک لائی تھی اور ہی طرح کی آنکھیں تھی تری چہرے پر تو کسی اور ستارے تم سے چمک لائی تھی تیری آواز ہی سب کچھ تھی مجھے مون سے جاں کیا کروں ہے وہ ہے وہ کہ تو بولی ہی بے حد کم مجھ سے تیری چپ سے ہی یہی محسو سے کیا تھا ہے وہ ہے وہ نے جیت جائےگا تیرا غم کسی روز مجھ سے شہر آوازیں لگاتا تھا م گر تو چپ تھی یہ تعلق مجھے تقاضا تھا م گر تو چپ تھی وہی انجام تھا جو عشق کا آغاز سے ہے تجھ کو پایا بھی نہیں تھا کہ تجھے کھونا تھا چلی آتی ہے یہی رسم کئی صدیوں سے یہی ہوتا ہے یہی ہوگا یہی ہونا تھا پوچھتا رہتا تھا تجھ سے کہ بتا کیا دکھ ہے اور مری آنکھ ہے وہ ہے وہ آنسو بھی نہیں ہوتے تھے ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے اندازے لگائے کے سبب کیا ہوگا پر مری تیر ترازو بھی نہیں ہوتے تھے جس کا ڈر تھا مجھے معلوم پڑا لوگوں سے پھروں حقیقت خوش بخت پلٹ آیا تیری دنیا ہے وہ ہے وہ ہے وہ ج سے کے جانے پہ مجھے تو نے جگہ دی دل ہے

Tehzeeb Hafi

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یاد ہے پہلے روز کہا تھا یاد ہے پہلے روز کہا تھا پھروں نہ کہنا غلطی دل کی پیار سمجھ کے کرنا لڑکی پیار نبھانا ہوتا ہے پھروں پار لگانا ہوتا ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا ساتھ چلو تو پورے سفر تک مر جانے کی اگلی خبر تک سمجھو یار خدا تک ہوگا سارا پیار وفا تک ہوگا پھروں یہ بندھن توڑ نہ جانا چھوڑ گئے تو پھروں نہ آنا چھوڑ دیا جو تیرا نہیں ہے چلا گیا جو میرا نہیں ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا یا تو ٹوٹ کے پیار نہ کرنا یا پھروں پیٹھ پہ وار نہ کرنا جب نادانی ہو جاتی ہے نئی کہانی ہو جاتی ہے نئی کہانی لکھ لاوں گا اگلے روز میں بک جاؤں گا تیرے گل جب کھیل جائیں گے مجھ کو پیسے مل جائیں گے یاد ہے پہلے روز کہا تھا بچھڑ گئے تو موج اڑانا واپس میرے پاس نہ آنا جب کوئی جا کر واپس آئے روئے تڑپے یا پچھتائے میں پھروں اس کو ملتا نہیں ہوں ساتھ دوبارہ چلتا نہیں ہوں گم جاتا ہوں کھو جاتا ہوں میں پتھر کا ہو جاتا ہوں

Khalil Ur Rehman Qamar

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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا

Jaun Elia

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?

Aves Sayyad

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"तलाश" हम तो दीवार-ओ-दर से थे उलझे हुए हम ने चाहा था साँसों की सरगम बने हम ने चाहा था दीदार-ए-महबूब हो हम सदाएँ तेरे दर पे देते रहे रक़्स करते रहे गीत गाते रहे खोए खोए ख़लाओं से घिरते रहे वक़्त रखता है दामन में यादें तेरी इन हवाओं से आती है ख़ुशबू तेरी देखते देखते तेरी तस्वीर को चाँद तारों भरी तेरी ता'बीर से उलझे उलझे हैं तेरे ही मंज़र सभी हम ने आँखों से देखी है दुनिया तेरी हम निसाबों से घिर के अजाबों में हैं ये जहाँ तो है हम पे अजाब-ए-सफ़र तेरे कहने पे लेकिन निकल आए है तेरे कहने पे हम ने क्या कुछ किया तेरे कहने पे इक रोज़ मर जाएँगे पर जहाँ को है तेरी ज़रूरत बड़ी तू कहाँ है कहाँ है कहाँ है कहाँ

Aves Sayyad

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"दीवानी बातें" मेरे कमरे में अक्सर ही ये यादें रक़्स करती है कभी दोस्ताँ बुलाए गर तो मैं घर से निकल आऊँ मचाऊँ शोर बाहर आ सुनाऊँ तुझ को हाल-ए-दिल जो कहता मूँद ले आँखें दिखाऊँ ख़्वाब फिर तुम को कहीं सन्नाटे में बैठा है तमाशा हँस के देखें हैं न करना ज़ेहन की बातें न समझे कुछ न जाने हैं मेरे ख़यालों के ये बच्चे सभी पागल दिवाने हैं झपक ली पलकें उस पर गर जी को कैसे सँभालेंगे मेरे गालों पे लाली है तेरे होंटो की ख़्वाहिश में जो ये मेरा मुकद्दर है गुमाँ है या हक़ीक़त है मोहल्ला दिल का है वीराँ तेरी पर याद महके हैं इसी महकी सी स्याही से लिखी दीवानी क़िस्मत है मेरी आँखें बोझल हैं कुछ बड़ी नाशाद पलकें हैं मेरे माथे कि सिलवट में तू क्या तक़दीर ढूँढ़े हैं है इस का ख़्वाब इतना सा तू सीने से आ लग जाए मेरे काँधे से लग कर रो मेरी आँखों में देखे फिर जो ये ख़्वाबों के मंज़र हैं समेटे दर्द आहों में सँभाले ज़ख़्म माज़ी के तेरी यादों के पैकर में हैं तस्वीरें पुरानी कुछ मेरा पागल सा दिल है इक धड़क कर शोर करता है घरों की खिड़की मानो जूँ हवा से नाचें गाए हैं किसी जंगल का कोई पेड़ जूँ बिजली चूम कर आए मुसाफ़िर जो भटक जाए नई इक राह को पाए तू आँसू देख आँखों के मचाए शोर पीड़ा में ये बहते आँसू के दरिया किसी साहिल पे बैठें हैं तेरी महताब सूरत को सँवारे अपने शाने पर मैं भी पत्थर की मूरत बन किनारे पर आ बैठा हूँ तुझे देखूँ मैं छत पर से तेरा ही अक्स दरिया में इसी उम्मीद को बाँधे मैं अपने घर की चौखट पर जमाए आँख बैठा हूँ दिवाना हूँ, दिवाना मैं दिवाने जैसी बातें हैं न जाने ज़ेहन में क्या क्या दिवाने ख़्वाब बुनता हूँ न सुन लेना मेरी नज़् में सभी बचकानी बातें हैं बहुत उलझा सा लड़का हूँ बहुत उलझी सी बातें हैं ख़मोशी ज़ेहन ‌की ओढ़े मैं कुछ भी बकता रहता हूँ ये बस अपना फ़साना है ये बस अपनी हक़ीक़त है न है तुझ से गिला कोई अब न अब तुझ से शिकायत है मैं पागल जैसा लड़का हूँ यूँँ ही मस्ती में रहता हूँ जो भी मैं कहता हूँ तुम सेे न इस पर ध्यान देना तुम हाँ तो कुछ बात ऐसी है मुझे तुम से मोहब्बत है

Aves Sayyad

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नज़्म:- रील जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, कुछ मंज़र हैं जो मैं ने खो दिए हैं, वो लोग जो मेरी ज़ात से मंसूब थे, मेरी ज़ात से आगे निकल गए हैं, वो लोग जिन को मैं ने लिखना सिखाया, वो अपनी कहानी से मुझ को मिटा चुके हैं, जिन के कासे भरे मैं ने दु'आओं से, वो नवाज़े गए तो मुझ ही को ख़ैरात करने लगे, हर वो शख़्स जिस को पलकों पर बैठाया मैं ने, मिज़्गाँ पे आते ही मेरी आँखें बंद कर दी, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, वो एक शख़्स, जिस सेे मैं ने बेइंतिहा मोहब्बत की, उसे लोग किसी और के तवस्सुत से जानते हैं, वो एक शाम जो मैं किसी पर उधार छोड़ आया था, उस का सूद अब कोई और खा रहा है, वो एक परीज़ाद जिस के होने पर नाज़ था मुझ को, वो दो आँखें जिन में ये ज़ीस्त बसर करनी थी, वो दोनों मेरे तमाम सानेहा की नाज़रीन थी, वो जिस के माथे को चूम कर मैं लौट आया था, जिस की ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म में अपने यादें छोड़ आया हूँ, अपने कपड़ों में जिस की महक, जिस के होंटों की निशानी ले आया हूँ, वो एक शख़्स, जिसे सिर्फ़ मेरा होना था, मैं उसे न जाने किन उलझनों में छोड़ आया, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, कुछ साल पहले तक, कुछ दोस्त थे मेरे, मेहकशों की टोली थी, अकड़ कर चलते थे, एक दूसरों के ग़म के साथी थे, वो गुलदस्ता अब बिखर चुका है, हर एक फूल मुरझा गए हैं, वो हँसते गाते चेहरे गूँगे पड़े हैं, वो तार जिन में कभी सरगम थी, तार तार हो कर बिखर चुके हैं, वो आँखें जिन में आने वाले मंज़र थे, माज़ी के पन्नों तले दफ़न पड़े हैं, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि हर जगह बस मैं ही मैं था, इन महफ़िलों में था, वीरानियों का साथी मैं था, मैं ने ही सहराओं में गीत गाए हैं, मैं ही नहाएा पत्थरों की बारिश में, चाँद की तन्हाई का साथी, सितारों को महफ़िल में रौशन, सूरज की आग को हवा देता, बर्फीले पहाड़ों को था में हुए, इन समंदरों को अपनी जगह रोके हुए, इन नदी दरियाओं को मिलता हुआ, सब को मंज़िल पर पहुँचता हुआ, तन्हाइयाँ सबकी मिटाता हुआ, मैं ही तो था, हर जगह बस मैं ही तो था, मैं ने ही चीरा नील को भी, मैं ही ज़िंदा था मछली में, आब-ए-जमजम मेरा मुक़द्दर, मैं ही लटका सूली पर, कर्बला में मैं ही कटा, मैं ने ही चाँद को काटा, मैं ही था सब सेे पहले, जन्नत थी मेरी जागीर, कुछ नहीं बचा, कुछ नहीं रहा, ये फ़िल्म भी अब ख़त्म हो रही है, रील भी पूरी हो चुकी है, साँस भी अब रुक गई है, मगर मैं फिर भी पलट पलट कर देख रहा हूँ अपनी ज़िंदगी की रील को, और मैं पाता हूँ कि मैं ने बहुत कुछ खो दिया है, मैं ने सब कुछ खो दिया है।

Aves Sayyad

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