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“Hijr” ke results
Sher
भरम रखा है तेरे हिज्र का वरना क्या होता है मैं रोने पे आ जाऊँ तो झरना क्या होता है मेरा छोड़ो मैं नइँ थकता मेरा काम यही है लेकिन तुम ने इतने प्यार का करना क्या होता है
Tehzeeb Hafi
कोई समुंदर, कोई नदी होती कोई दरिया होता हम जितने प्यासे थे हमारा एक गिलास से क्या होता ता'ने देने से और हम पे शक करने से बेहतर था गले लगा के तुम ने हिजरत का दुख बाट लिया होता
Tehzeeb Hafi
मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
हिज्र में तुम ने केवल बाल बिगाड़े हैं हम ने जाने कितने साल बिगाड़े हैं
Anand Raj Singh
दर्द-ए-मुहब्बत दर्द-ए-जुदाई दोनों को इक साथ मिला तू भी तन्हा मैं भी तन्हा आ इस बात पे हाथ मिला
Abrar Kashif
तेरी गली को छोड़ के पागल नहीं गया रस्सी तो जल गई है मगर बल नहीं गया मजनूँ की तरह छोड़ा नहीं मैं ने शहर को या'नी मैं हिज्र काटने जंगल नहीं गया
Ismail Raaz
मोहब्बत दो-क़दम पर थक गई थी मगर ये हिज्र कितना चल रहा है
Zubair Ali Tabish
पहले लगा था हिज्र में जाएँगे जान से पर जी रहे हैं और भी हम इत्मीनान से
Ankit Maurya
गुजर चुकी जुल्मते शब-ए-हिज्र, पर बदन में वो तीरगी है मैं जल मरुंगा मगर चिरागों के लो को मध्यम नहीं करूँगा ये अहद ले कर ही तुझ को सौंपी थी मैं ने कलबौ नजर की सरहद जो तेरे हाथों से क़त्ल होगा मैं उ
Tehzeeb Hafi
या'नी कि इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ वो शख़्स सालों बा'द भी कितना हसीन है वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ
Kushal Dauneria
Nazm
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का
Varun Anand
"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फै
Tehzeeb Hafi
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी
Tahir Faraz
"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बा
Sohaib Mugheera Siddiqi
तमाम रात सितारों से बात रहती थी कि सुब्ह होते ही घर से फूल आते थे वो किस के नक़्श उभरते थे तेग़ पर अपनी वो किस ख़याल में हम जंग जीत जाते थे हमें भी क़हत में एक चश्म-ए-ज़र मुयस्सर थी कोई हथेलियाँ
Tehzeeb Hafi
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी ह
Tahir Faraz
निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद क
Faiz Ahmad Faiz
ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल कही
Faiz Ahmad Faiz
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नाम राह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम मंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ाम दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भी देख
Chakbast Brij Narayan
ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल कहीं त
Faiz Ahmad Faiz
Ghazal
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत
Jaun Elia
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी
Tehzeeb Hafi
एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो औ
Tehzeeb Hafi
किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे
Jaun Elia
मलाल है मगर इतना मलाल थोड़ी है ये आँख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है बस अपने वास्ते ही फ़िक्र-मंद हैं सब लोग यहाँ किसी को किसी का ख़याल थोड़ी है परों को काट दिया है उड़ान से पहले ये ख़ौफ़-ए-हिज्र है शौक
Parveen Shakir
याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र
Umair Najmi
अश्क ज़ाया' हो रहे थे, देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना, मैं वहाँ रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ, जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पर कितने एहसान है गुज़रे,
Tehzeeb Hafi
तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़
Fahmi Badayuni
अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा
Khalil Ur Rehman Qamar
हम तुम्हारे ग़म से बाहर आ गए हिज्र से बचने के मंतर आ गए मैं ने तुम को अंदर आने का कहा तुम तो मेरे दिल के अंदर आ गए एक ही औरत को दुनिया मानकर इतना घुमा हूँ कि चक्कर आ गए इम्तिहान-ए-इश्क़ मुश्किल था मग
Tehzeeb Hafi