sherKuch Alfaaz
मोहब्बत ने मुझे औक़ात दिखला दी ज़रूरी क्यूँँ है धन ये बात सिखला दी
Writer
@aatishindori
0
Sher
0
Ghazal
1
Nazm
मोहब्बत ने मुझे औक़ात दिखला दी ज़रूरी क्यूँँ है धन ये बात सिखला दी
माना कि धागे पक्के हैं कच्चे नहीं कॉलेज के रिश्ते मगर टिकते नहीं
जब से हम ज़िंदगी को समझने लगे तब से हम ख़ुद-कुशी को समझने लगे
फंदा-वंदा छोड़ कर मैं दूजा सपना बुन रहा हूँ ख़ुद-कुशी तुझ को नहीं मैं ज़िंदगी को चुन रहा हूँ
एक बच्चे की तरह सच्चे थे जब हमारे मकान कच्चे थे
ज़माने वाले तो तय है सताएँगे तुझे सोनम मुझे अब्दुल बताएँगे
यूँँ तो कोठियाँ हैं यहाँ बहुत मुझे फिर भी लोग मिले नहीं मैं समझ गया भले देर से बड़े शहर दिल के बड़े नहीं
उस की चाहत की थाह देखूँगा सब सेे पहले निगाह देखूँगा
तिजोरी तो भरी लेकिन ठगाई भी की उस ने वफ़ा की ढेर लेकिन बेवफ़ाई भी की उस ने
थोड़े-मोड़े थोड़ी हम तो बेहद अजीब थे रस्ते तब बदले जब हम मंज़िल के क़रीब थे