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ज़िंदगी भी आख़िरश तंहाई है मैं भला तन्हाई से क्यूँ डर गया
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Ghazal
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Nazm
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ज़िंदगी भी आख़िरश तंहाई है मैं भला तन्हाई से क्यूँ डर गया
तुम्हारे शहर में आ कर ठिकाना ढूँढ़ते हैं हम अपने शहर में होते तो घर गए होते
तन्हाई में अक्सर हद से गुजरती है जीने नहीं देती यादों की पुरवाई
तमाम उम्र हमें साथ साथ चलना है बस इतना कह के सफ़र कर लिया जुदा उस ने
सौ ज़ख़्म दिल पे हैं मेरे सौ ज़ख़्म मेरी जाँ क्या एक-एक दिल मेरा दिखलाए आप को
न जाने किस गली में रूठ जाए ज़िंदगी हम सेे न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
मिरी जाँ बेबसी क्या दर्द क्या है ये उन सेे पूछना जो बे-ज़बाँ हैं
मैं कहता था मगर तू ने न मानी पर अब तेरा भी दिल भर ही गया ना
किसी को रौशनी देने की ख़ातिर चराग़ इक उम्र भर जलता रहा है
कहते हैं सामिईन उसे जाम-ए-जम-ए-हुस्न वो जाम बिन पिए ही जो बहकाए आप को