दिया जला के सभी बाम-ओ-दर में रखते हैं और एक हम हैं इसे रह-गुज़र में रखते हैं

Writer
Abrar Kashif
@abrar-kashif
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Sher
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Ghazal
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
घर की तक़्सीम में अँगनाई गँवा बैठे हैं फूल गुलशन से शनासाई गँवा बैठे हैं
sherKuch Alfaaz
करती है तो करने दे हवाओं को शरारत मौसम का तकाज़ा है कि बालों को खुला छोड़
sherKuch Alfaaz
हर एक लफ़्ज़ के तेवर ही और होते हैं तेरे नगर के सुख़न-वर ही और होते हैं
sherKuch Alfaaz
अब के हम तर्क-ए-रसूमात कर के देखते हैं बीच वालों के बिना बात कर के देखते हैं
sherKuch Alfaaz
अब तो लगता है कि आ जाएगी बारी मेरी किस ने दे दी तेरी आँखों को सुपारी मेरी
sherKuch Alfaaz
सितारे और क़िस्मत देख कर घर से निकलते हैं जो बुज़दिल हैं मुहूरत देख कर घर से निकलते हैं
sherKuch Alfaaz
मैं अपने दोनों तरफ़ एक सा हूँ तेरे लिए किसी से शर्त लगा फिर मुझे उछाल के देख
sherKuch Alfaaz
दर्द-ए-मुहब्बत दर्द-ए-जुदाई दोनों को इक साथ मिला तू भी तन्हा मैं भी तन्हा आ इस बात पे हाथ मिला
sherKuch Alfaaz
दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या? बेनतीजा ये मुलाक़ात ज़रूरी थी क्या