sherKuch Alfaaz
अजल से ले कर अब तक औरतों को सिवाए जिस्म क्या समझा गया है

Writer
@ali-zaryoun
45
Sher
31
Ghazal
3
Nazm
अजल से ले कर अब तक औरतों को सिवाए जिस्म क्या समझा गया है
हम ऐसा कहने वाले जब तलक है ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी
अस्र के वक़्त मेरे पास न बैठ मुझ पे इक साँवली का साया है
तन्हा ही सही लड़ तो रही है वो अकेली बस थक के गिरी है अभी हारी तो नहीं है
ख़याल में भी उसे बे-रिदा नहीं किया है ये ज़ुल्म मुझ सेे नहीं हो सका नहीं किया है
मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी 'अली' कि उस को देख के बस अपनी याद आती थी
जागना और जगा के सो जाना रात को दिन बना के सो जाना
ये बद-तमीज़ अगर तुझ से डर रहे हैं तो फिर तुझे बिगाड़ के मैं ने बुरा नहीं किया है
मैं सोचता हूँ न जाने कहाँ से आ गए हैं हमारे बीच ज़माने कहाँ से आ गए हैं
आगे तो आने दीजिए रस्ता तो छोड़िए हम कौन हैं ये सामने आ कर बताएँगे