sherKuch Alfaaz
ख़ौफ़ खाता है क्यों ज़माने का तुझे तो फ़न है आज़माने का
Writer
@anshika15072002
0
Sher
0
Ghazal
1
Nazm
ख़ौफ़ खाता है क्यों ज़माने का तुझे तो फ़न है आज़माने का
चाँद जुगनू से लड़ रहा है क्यूँ चाँद में ख़ुद की रौशनी है क्या
ज़िंदगी हमक़दम रही लेकिन वक़्त से हमक़दम नहीं होती
वो जिस हमदर्द को आँसू मिरे अश'आर लगते थे उसी बे-दर्द को मेरी हँसी अच्छी नहीं लगती
इश्क़ वहशत कैफ़ियत और कुछ किताबें बस इन्हीं से ज़िंदगानी चल रही है
आप के सिम्त से जाने की तमन्ना तो नहीं फ़िक्र मत करिए चले जाएँगे रफ़्ता रफ़्ता
ये कहने की इजाज़त चाहिए थी हमें थोड़ी रियायत चाहिए थी
टूटा सूखा पत्ता पतझर में कहने लगता है मुझ सेे अब जब हम बर्बाद हुए हैं तब जा कर के महकी हो तुम
तेरा मेआ'र तो अपनी जगह है मगर बीमार तो अपनी जगह है
परिंदे भी मुड़कर नहीं आएँगे क्या दरख़्तों के दिन अब गुज़र जा रहे हैं