sherKuch Alfaaz
तमाम उम्र अकेले में तुझ से बातें कीं तमाम उम्र तेरे रू-ब-रू ख़मोश रहे
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@khursheed-rizvi
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तमाम उम्र अकेले में तुझ से बातें कीं तमाम उम्र तेरे रू-ब-रू ख़मोश रहे
कभी अपनी आँख से ज़िंदगी पे नज़र न की वही ज़ाविए कि जो आम थे मुझे खा गए
कब निकलता है कोई दिल में उतर जाने के बा'द इस गली की दूसरी जानिब कोई रस्ता नहीं
जिन लोगों में रहता हूँ मैं उन में से नहीं हूँ हूँ कौन मुझे अपना ज़माना नहीं मिलता
जब कभी ख़ुद को ये समझाऊँ कि तू मेरा नहीं मुझ में कोई चीख़ उठता है नहीं ऐसा नहीं
आसाँ तो नहीं अपनी हस्ती से गुज़र जाना उतरा जो समुंदर में दरिया तो बहुत रोया
तू मुझे बनते बिगड़ते हुए अब ग़ौर से देख वक़्त कल चाक पे रहने दे न रहने दे मुझे
आख़िर को हँस पड़ेंगे किसी एक बात पर रोना तमाम उम्र का बे-कार जाएगा
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