sherKuch Alfaaz
जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी

Writer
@kumar-vishwas
13
Sher
3
Ghazal
3
Nazm
जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी
चारों तरफ़ बिखर गईं साँसों की ख़ुशबुएँ राह-ए-वफ़ा में आप जहाँ भी जिधर गए
रात के जिस्म में जब पहला पियाला उतरा दूर दरिया में मेरे चाँद का हाला उतरा
दिल के तमाम ज़ख़्म तेरी हाँ से भर गए जितने कठिन थे रास्ते वो सब गुज़र गए
मेरा ख़याल तेरी चुप्पियों को आता है तेरा ख़याल मेरी हिचकियों को आता है
हम कहाँ हैं ये पता लो तुम भी बात आधी तो सँभालो तुम भी
उसी की तरह मुझे सारा ज़माना चाहे वो मिरा होने से ज़्यादा मुझे पाना चाहे
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
बचपना ऐ लड़को तुम सेे कभी छूटता ही नहीं जवान होना तो बस लड़कियों को आता है
सखियों संग रँगने की धमकी सुन कर क्या डर जाऊँगा तेरी गली में क्या होगा ये मालूम है पर आऊँगा