तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं
nakul kumar
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कुछ नहीं है ज़िंदगी बर्बाद है अब तो मर गया हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में
कहो क्या हो गया जो मिल न पाए यार से अपने निहारो चाँद को फिर यार के घर द्वार को देखो
जी भर गया है अब तो जी भर चाहने वालों से भाग रहा हूँ मैं भी मुझ सेे भागने वालों से
इन्हीं पिछले दिनों से कुछ मुझे इस बात का ग़म है अगर मैं रो रहा हूँ तो तिरी क्यूँँ आँख पुर-नम है
तुम जैसे ना-मुराद की सुनता रहा है वो जिस ने नहीं सुनी कभी अपनी भी आज तक
मैं न कहती हूँ कि लाओ चाँद तारे तोड़कर बस मुझे इस हाल में ऐसे न जाओ छोड़कर
इसी ख़ातिर तुझे मिलता नहीं मैं आजकल अक्सर मुझे मालूम है ये मन तिरा भर जाएगा मुझ सेे
हर बार मुझे हर साँस मिरी इक बात यही समझाती है कुछ काम करो कुछ नाम करो ये उम्र निकलती जाती है
काम से निकले तो फिर ये लोग सब घर जाएँगे घर न जा पाए तो फिर ये राह में मर जाएँगे