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दुनिया की इन अजीब रस्मों से कौन मरता है झूठी क़समों से
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दुनिया की इन अजीब रस्मों से कौन मरता है झूठी क़समों से
ज़ख़्मों का तुम हिसाब दो लौटा कर तुम वो ख़्वाब दो
ये क्या नित कोई डरने की बात है या फिर ख़ुश-नसीबी जो तू साथ है
वैसे तो नित कोई ग़म नहीं हैं पर मुस्कुराते अब हम नहीं हैं
वादे से फिर मुकर गया है कोई टूट कर फिर बिखर गया है कोई
उस की इबादत बुरी है 'नित' तेरी आदत बुरी है
उस की फ़रियाद में मरे हम बे-वफ़ा की याद में मरे हम
उसे इस बात का एहसास क्यूँँ हो नदी को नीर की अब प्यास क्यूँँ हो
उन का आज रिश्ता आया है मौत का फ़रिश्ता आया है
तुम को हम याद भी न कर पाए ख़ुद को बर्बाद भी न कर पाए