गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा

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Rahat Indori
@rahat-indori
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Sher
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Ghazal
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Nazm
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
ऐ वतन इक रोज़ तेरी ख़ाक में खो जाएँगे सो जाएँगे मर के भी रिश्ता नहीं छूटेगा हिंदुस्तान से ईमान से
sherKuch Alfaaz
मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का
sherKuch Alfaaz
वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के लौट आया
sherKuch Alfaaz
मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के
sherKuch Alfaaz
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते जाते
sherKuch Alfaaz
साथ चलना है तो तलवार उठा मेरी तरह मुझ सेे बुज़दिल की हिमायत नहीं होने वाली
sherKuch Alfaaz
माँ के क़दमों के निशाँ हैं कि दिए रौशन हैं ग़ौर से देख यहीं पर कहीं जन्नत होगी
sherKuch Alfaaz
ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे
sherKuch Alfaaz
उस की याद आई है साँसों ज़रा आहिस्ता चलो धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है