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सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके जी चाहता है फिर उसे इक बार देखना
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सौ बार जिस को देख के हैरान हो चुके जी चाहता है फिर उसे इक बार देखना
इक रोज़ छीन लेगी हमीं से ज़मीं हमें छीनेंगे क्या ज़मीं के ख़ज़ाने ज़मीं से हम
ग़लत-फ़हमियों में जवानी गुज़ारी कभी वो न समझे कभी हम न समझे
भीड़ तन्हाइयों का मेला है आदमी आदमी अकेला है
आप के लब पे और वफ़ा की क़सम क्या क़सम खाई है ख़ुदा की क़सम
अपने जलने में किसी को नहीं करते हैं शरीक रात हो जाए तो हम शम्अ' बुझा देते हैं
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