ये क़ल्ब कहाँ रह पाता है तब काबू में जब बैठा करती है वो मेरे बाज़ू में
Writer
Sandeep dabral 'sendy'
@sandeepdabral
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Sher
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Ghazal
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Nazm
ये मानो न मानो यहाँ अपना कल सुन रहा है ये पढ़ने की इस उम्र में जो ग़ज़ल सुन रहा है
यार मुकम्मल हो न सका अफ़साना जिन का भी उन को बात मुहब्बत की बे-मतलब लगती है
यार अनोखा जादू है याँ उस की कोमल बाँहों में मुरझाए चेहरे खिल जाते हैं बस इक आलिंगन से
यार अगर वो हाँ कह दे तो ख़ुद को आऊँ सौंप उसे झुमका तो बस मामूली नज़राना है उस की ख़ातिर
यादों के जंगल में आता नइँ याँ गाहे पतझड़ का मौसम सो बूढ़ी आँखों में भी यादों के पेड़ हरे भरे मिलते हैं
याद यहाँ सिरहाने मेरे आ कर बैठा करती है ग़ुस्से में वो तनकर भौंहें रोब जमाया करती है
याँ जिस के इंतिज़ार में ज़ाया' की अपनी सारी उम्र उस ने ही मुझ को याद के यहाँ क़ाबिल तक नइँ समझा
वो भी क्या दिन थे जब घंटों तक बातें हुआ करती थी आवाज़ तिरी सुनने को कान मिरे अब तरस गए हैं
वो तो मैं हूँ जो अब तक ठीक-ठाक हूँ वरना ये इतने ग़म और किसी को पागल कर देते