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ये तो बस मेरा मुक़द्दर नईं सही वरना कोई ऐब नईं “दीवानी“ में
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ये तो बस मेरा मुक़द्दर नईं सही वरना कोई ऐब नईं “दीवानी“ में
ये कैसा जादू तू ने कर दिया है मुझ पे मेरी जाँ? किसी को भी मैं देखूँ चेहरा तेरा याद आता है
ये इश्क़ का सफ़र तो ठीक पर रास्ता अजीब है
यही इक खासियत है मुझ में शायद
याद तुम को भी बहुत आएँगे हम बे-सबब जिस रोज़ मर जाएँगे हम
वो लाख था बुरा दुनिया की नज़र में पर उस ने बुरा कभी भी हमारा नहीं किया
वही गुज़रेगी आख़िर में 'करन' मुझ पर जो गुज़री आज तक हर एक आशिक़ पे
उस सेे शिकायत होती है जिस सेे मुहब्बत होती है
तू ने ही तो चाहा था के मैं तेरा बनके रहूँ बस मैं ने सो तेरी ख़ुशी के वास्ते हर शय भुला दी
तुझे गर शर्म आती है पुराने इन लिबासों पे तो मेरी जाँ सड़क पे लोगों को तू बे-लिबादा देख