sherKuch Alfaaz
सहरा से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को हाथों में फूल हैं मेरे पाँव में रेत है

Writer
@tehzeeb-hafi
75
Sher
87
Ghazal
18
Nazm
सहरा से हो के बाग़ में आया हूँ सैर को हाथों में फूल हैं मेरे पाँव में रेत है
इस लिए रौशनी में ठंडक है कुछ चराग़ों को नम किया गया है
इक तेरा हिज्र दाइमी है मुझे वर्ना हर चीज़ आरज़ी है मुझे
तमाम नाख़ुदा साहिल से दूर हो जाएँ समुंदरों से अकेले में बात करनी है
मैं जिस के साथ कई दिन गुज़ार आया हूँ वो मेरे साथ बसर रात क्यूँँ नहीं करता
मैं जंगलों की तरफ़ चल पड़ा हूँ छोड़ के घर ये क्या कि घर की उदासी भी साथ हो गई है
पेड़ मुझे हसरत से देखा करते थे मैं जंगल में पानी लाया करता था
यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बैठा कर आ रहे हैं
ये एक बात समझने में रात हो गई है मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
मैं सुख़न में हूँ उस जगह कि जहाँ साँस लेना भी शा'इरी है मुझे