sherKuch Alfaaz
ऊँचे नीचे घर थे बस्ती में बहुत ज़लज़ले ने सब बराबर कर दिए

Writer
@zubair-ali-tabish
43
Sher
17
Ghazal
3
Nazm
ऊँचे नीचे घर थे बस्ती में बहुत ज़लज़ले ने सब बराबर कर दिए
हमारा दिल तो हमेशा से इक जगह पर है तुम्हारा दर्द ही रस्ता भटक गया होगा
चूड़ियाँ बेच के वो मेरे लिए लाई 'गिटार' तार छेड़ूँ तो खनकने की सदा आती है
आइना कब बनाओगे मुझ को मुझ से किस दिन मिलाओगे मुझ को
इस दर का हो या उस दर का हर पत्थर पत्थर है लेकिन कुछ ने मेरा सर फोड़ा हैं कुछ पर मैं ने सर फोड़ा है
अब तलक उस को ध्यान हो मेरा क्या पता ये गुमान हो मेरा
दरख़्त काट के जब थक गया लकड़हारा तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया
पहेली ज़िंदगी की कब तू ऐ नादान समझेगा बहुत दुश्वारियाँ होंगी अगर आसान समझेगा
कोई तितली निशाने पर नहीं है मैं बस रंगों का पीछा कर रहा हूँ
किसी का हाथ थाम लूँ मैं वो तन्हा मिल गया तो क्या कहूँगा