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دور جوانی اسی عمر ہے وہ ہے وہ جو بھی کرنا ہے کر لو اسی عمر ہے وہ ہے وہ جاناں کہ سج لو سنور لو نہیں عمر پھروں لوٹ کر آوےگی عشق دل یہ یہی ہے سمجھ لو خدا کا اشارہ ملےگی نہیں زندگی پھروں دوبارہ اسی عمر ہے وہ ہے وہ عیش و آرام کر لو اسی عمر ہے وہ ہے وہ چاہو جاناں نام کر لو بے حد قیمتی ہے جوانی کا موسم اسی ہے وہ ہے وہ ہے برسات پت جھڑ کا موسم بے حد قیمتی ہے یہ دور جوانی لگ آوےگی عشق دل پھروں لوٹ کر یہ جوانی ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں کہ رہا ہوں سبھی سے تبارہ ملےگی نہیں زندگی پھروں دوبارہ اسی عمر ہے وہ ہے وہ سارے بچے بگڑتے اسی عمر ہے وہ ہے وہ سارے بچے سدھرتے ا گر اس کا کو چاہو تو سونا بنا لو ا گر اس کا کو چاہو کھلونا بنا لو یہ پہاڑ یہ ندیاں سبھی پیڑ پودھے سبھی اپنے پتھ پر چلے جا رہے ہیں ز ہے وہ ہے وہ ہے وہ آ سماں کہ رہے چاند تارے یہی کہ رہا ہے ن گرا کا کنارہ ملےگی نہیں زندگی پھروں دوبارہ

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مجھ سے پہلی سی محبت مری محبوب لگ مانگ مجھ سے پہلی سی محبت مری محبوب لگ مانگ ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے سمجھا تھا کہ تو ہے تو درخشاں ہے حیات تیرا غم ہے تو غم دہر کا جھگڑا کیا ہے تیری صورت سے ہے عالم ہے وہ ہے وہ بہاروں کو ثبات تیری آنکھوں کے سوا دنیا ہے وہ ہے وہ رکھا کیا ہے تو جو مل جائے تو تقدیر نگوں ہوں جائے یوں لگ تھا ہے وہ ہے وہ نے فقط چاہا تھا یوں ہوں جائے اور بھی دکھ ہیں زمانے ہے وہ ہے وہ محبت کے سوا راحتیں اور بھی ہیں وصل کی راحت کے سوا ان گنت صدیوں کے تاریک بہیما لگ طلسم ریشم و اطلَ سے و کمخواب ہے وہ ہے وہ بنوائے ہوئے جا بجا بکتے ہوئے کوچہ و بازار ہے وہ ہے وہ جسم خاک ہے وہ ہے وہ لُتھڑے ہوئے خون ہے وہ ہے وہ نہلائے ہوئے جسم نکلے ہوئے امراض کے تنوروں سے پیپ بہتی ہوئی گلتے ہوئے ناسوروں سے لوٹ جاتی ہے ادھر کو بھی نظر کیا کیجے اب بھی دلکش ہے ترا حسن م گر کیا کیجے اور بھی دکھ ہیں زمانے ہے وہ ہے وہ محبت کے سوا راحتیں اور بھی ہیں وصل کی راحت کے سوا مجھ سے پہلی سی محبت مری محبوب لگ مانگ

Faiz Ahmad Faiz

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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سزا ہر بار مری سامنے آتی رہی ہوں جاناں ہر بار جاناں سے مل کے بچھڑتا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ جاناں کون ہوں یہ خود بھی نہیں جانتی ہوں جاناں ہے وہ ہے وہ ہے وہ کون ہوں ہے وہ ہے وہ خود بھی نہیں جانتا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ جاناں مجھ کو جان کر ہی پڑی ہوں عذاب ہے وہ ہے وہ ہے وہ اور ا سے طرح خود اپنی سزا بن گیا تو ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ جاناں ج سے زمین پر ہوں ہے وہ ہے وہ ا سے کا خدا نہیں پ سے سر بسر اذیت و الا آزار ہی رہو بیزار ہوں گئی ہوں بے حد زندگی سے جاناں جب ب سے ہے وہ ہے وہ کچھ نہیں ہے تو بیزار ہی رہو جاناں کو ی ہاں کے سایہ و الا پرتو سے کیا غرض جاناں اپنے حق ہے وہ ہے وہ بیچ کی دیوار ہی رہو ہے وہ ہے وہ ہے وہ یعنی سے بےمہر ہی رہا جاناں انتہا عشق کا گاہے ہی رہو جاناں خون تھوکتی ہوں یہ سن کر خوشی ہوئی ا سے رنگ ا سے ادا ہے وہ ہے وہ بھی سخن ساز ہی رہو ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے یہ کب کہا تھا محبت ہے وہ ہے وہ ہے نجات ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے یہ کب کہا تھا وفادار ہی رہو اپنی متا ناز لٹا کر مری لیے بازار التفات ہے وہ ہے وہ نادار

Jaun Elia

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا

Jaun Elia

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چاند تکتا ہے راتوں کو چھت سے تجھے کیوں ہے اتنی جواں کیوں ہے اتنی حسین نام ک سے نے رکھا تیرا زہرہ جبیں تنگ سی ٹاپ پہنے اب آنا نہیں چاند تکتا ہے راتوں کو چھت سے تجھے راہ ہے وہ ہے وہ دیکھتا ہے پلٹ کے تجھے مجھ کو ڈر ہے کہی لے لگ جائے تجھے راہ ہے وہ ہے وہ دیکھتا ہے پلٹ کے تجھے چاند تکتا ہے راتوں کو چھت سے تجھے چاند ہے وہ ہے وہ داغ ہے پھروں بھی مغرور ہے لگ رہا اپنی عادت سے مجبور ہے تو جدھر جا رہا چاند ادھر آ رہا یہ تجھے دیکھ کر کتنا شرما رہا آڑ ہے وہ ہے وہ دیکھتا ہے سمٹ کے تجھے چاند تکتا ہے راتوں کو چھت سے تجھے خوبصورت بے حد لگ رہی آج تو آج سے بن گئی مری ممتاز جب کیسی کاریگری ہے خدا کی قسم زلف سے پاؤں تک زہر ہے تو صنم ہے وہ ہے وہ ہے وہ تری جان ہوں تو مری جان ہے خواب ہے وہ ہے وہ دیکھتا ہوں لپٹ کے تجھے چاند تکتا ہے راتوں کو چھت سے تجھے اپنی صورت دکھا دے خدا کے لیے مجھ کو دل ہے وہ ہے وہ بسا لے خدا کے لیے اب تو گھر سے نکل آ خدا کے لیے مجھ کو اپنا بنا لے خدا کے لیے عمر بھر کے لیے با ہوں ہے وہ ہے وہ تھام

Prashant Kumar

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م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے تو سب سے جدا ہے تو سب سے حسین ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے زمانے ہے وہ ہے وہ تجھسا لگ کوئی کہی ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے تجھے دیکھ کر ہی نکلتا ہے سورج تجھے دیکھ کر روز ڈھلتا ہے سورج تو اک باوضو اپسرا ہے مری جاں خدا بھی تو تجھ پہ فدا ہے مری جاں تجھی سے محبت کرےگا یقین ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے تجھے کام سب چھوڑ کر دیکھتے ہیں بنا بات کے پھول بھی پھینکتے ہیں کہ ممتاز بھی تری جیسی نہیں ہے ی ہاں ایک تو ہی مہا سندری ہے بے حد خوبصورت ہے زہرہ جبیں ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے

Prashant Kumar

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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी

Prashant Kumar

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"ज़मीं-ए-हिंद" सारे जहाँ से अच्छी बस हिंद की ज़मीं है आबाद करने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस के ही लब पे पहले वहदत का गीत आया इसने ही सब सेे पहले पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया सारे जहाँ को इसने इल्म-ओ-हुनर सिखाया कोई भी गीत क़ौमी इसने न गुनगुनाया नंगे उघारे फिरते लोगों की आबरू को मिंदील देने वाली हर एक को ज़मीं है दुश्नाम दे रहा है हर शख़्स इस ज़मीं को तिरपाल जब दिया है इसने ही हर किसी को सारे जहाँ को इसने जीवन नया दिया है सहराओं तक में इसने हर गुल खिला दिया है निखरे हैं इस ज़मीं में रुख़सार हम-नशीं के गजरे में खिलने वाला गुलफ़ाम भी ज़मीं है हिंदू का है न इस पर मुर्ग-ए-हरम का एहसाँ अंधा हुआ पड़ा है क्यूँँ धर्म में फिर इंसाँ शामिल है ख़ून इस में हम सबके तन बदन का सदक़ा उठा रहे हैं सब इस के बाँकपन का सारा जहाँ पला है आँचल में इस ज़मीं के ताक़ों पे धरने वाली हर क़ौम को ज़मीं है ज़िंदा है इस के दम पर सारे जहाँ की रौनक़ सब आज़मा रहे हैं इस के ही दम पे क़िस्मत इसने नहीं सिखाया आपस में बैर करना इसने सिखाया सब को आपस में प्रेम करना हिंदू हों या हों मुस्लिम वंदे हैं सब इसी के आँचल में लेने वाली इक साथ सब ज़मीं है है इस ज़मीं पे सबका हक़ एक ही बराबर कोई नहीं है नीचे कोई नहीं है ऊपर दुख सुख में इस के हरदम सब लोग साथ होंगे मुस्लिम हों सिख हों हिंदू सब साथ साथ होंगे आएगी आँच इस पर हाथों में हाथ होंगे सब छाँव में इसी की पलकर बड़े हुए हैं दाना खिलाने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस पर जब आँच आए सब साथ चल के आना धर्मों को मज़-हबों को रस्ते में छोड़ आना क़ौमी लिबास सारे घूरे पे फेंक आना हाथों में हाथ डाले सब मुस्कुराते आना तुम मुश्किलों में इस को मत छोड़ कर के जाना तरसे हैं इस ज़मीं को मत पूछो कितने काफ़िर इक़बाल से मिली पर तुम को ही ये ज़मीं है इस हिंद की ज़मीं पर जो भी उठाए उँगली उस को अभी उठा ले ख़ालिक़ तू इस जहाँ से इस हिंद की ज़मीं पर जिस का जनम हुआ है आबाद रखना ख़ालिक़ मेरी यही दुआ है

Prashant Kumar

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"दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है" अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है होंठों पे मिरे प्यार का पैग़ाम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है ये रोग जवानी में सभी को ही लगा है बिन इश्क़ मोहब्बत के भला किस का हुआ है ऐसा है यहाँ कौन जो बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मतलब की मोहब्बत से परेशान रहा हूँ मैं क्यूँँकि यहाँ बनके इक इंसान रहा हूँ कैसा भी कहीं दिल को अब आराम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है लोगों ने मोहब्बत का यहाँ ढोंग रचाया वादे सभी झूटे किए इल्ज़ाम लगाया मुझ सा कोई आशिक़ कहीं बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मैं जाऊँ जिधर लोग हँसी मेरी उड़ाते पागल भी बताते हैं मुझे फिर भी सताते मालिक तिरी दुनिया में मिरा काम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है

Prashant Kumar

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