nazmKuch Alfaaz

"ख़्वाबों का सौदागर" सुनहरे मंज़र बड़े पहाड़ों से गिर के बे-मौत मर गए हैं जो चाँद है वो नदी के पानी में लम्हा लम्हा लरज़ रहा है जो चाँदनी थी घरों की छत पर बिखर गई है हमारे कमरे की लाइटें बंद हो गई हैं हर इक दरीचे ने अपनी बाहें समेट ली हैं शिकस्ता दीवार पर पुरानी उदास पेंटिंग लगी हुई है वो इस अँधेरे में मुझ पर अपने तमाम नुक़्तों को खोलती है मेरे सिरहाने अजीब काला सा एक साया कोई कहानी सुना रहा है गुज़िश्ता चेहरे गुज़िश्ता गलियाँ गुज़िश्ता पैकर दिखा रहा है मगर मैं फिर भी हर एक शय में से ध्यान का ज़र चुरा रहा हूँ कि मुझ को ख़्वाबों में आज फिर से हमारी वस्लत के क़ीमती पल ख़रीदने हैं

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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا

Jaun Elia

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"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम?

Aves Sayyad

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کیوں ہے جاناں نہیں ہوں ی ہاں پر پھروں بھی تمہارے ہونے کا احسا سے کیوں ہے کچھ ہے نہیں مری ہاتھ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں بھی کچھ ہونے کی یہ آ سے کیوں ہے بڑی حیرانی ہے مجھے کی حقیقت دور ہوکر بھی اتنا پا سے کیوں ہے سب نے کہا کہ حقیقت تو پرایا ہے حقیقت پرایا ہوکر بھی اتنا خاص کیوں ہے جتنا حقیقت دور ہے مجھ سے حقیقت اتنا ہی مجھ کو را سے کیوں ہے بیٹھا ہوں بلکل اکانت ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں بھی کانوں ہے وہ ہے وہ ا سے کی آواز کیوں ہے کھل کے نہیں کہتی حقیقت کچھ بھی ا سے کی آنکھوں ہے وہ ہے وہ اتنے راز کیوں ہیں بسی ہے دل ہے وہ ہے وہ حقیقت مری یہ میرا دل ا سے کا سمپتی کیوں ہے اس کا کا کو نہیں بھلا سکتا ہے وہ ہے وہ ہے وہ یہ ا سے کے نام کی ہر شوا سے کیوں ہے پوری کائنات ا سے کی یاد دلاتی ہے یہ تن من ہے وہ ہے وہ ا سے کا وا سے کیوں ہے حقیقت مری ہوئی نہیں ہے ابھی اس کا کا کو کھونے کے ڈر سے من اتنا بدحوا سے کیوں ہے دوریاں لکھی ہیں چنو درمیان میرا نصیب مجھ سے اتنا ناراض کیوں ہے ایسے شبد ک ہاں سے لاؤں کی حقیقت سمجھے

Divya 'Kumar Sahab'

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مریم ہے وہ ہے وہ ہے وہ آئینوں سے گریز کرتے ہوئے پہاڑوں کی کوکھ ہے وہ ہے وہ سان سے لینے والی ادا سے جھیلوں ہے وہ ہے وہ اپنے چہرے کا عک سے دیکھوں تو سوچتا ہوں کہ مجھ ہے وہ ہے وہ ایسا بھی کیا ہے مریم تمہاری بے ساختہ محبت ز ہے وہ ہے وہ ہے وہ پہ پھیلے ہوئے سمندر کی وسعتوں سے بھی ماورا ہے محبتوں کے سمندروں ہے وہ ہے وہ ب سے ایک بحرہ ہجر ہے جو برا ہے مریم خلا نوردوں کو جو ستارے تم معاوضے ہے وہ ہے وہ ملے تھے حقیقت ان کی روشنی ہے وہ ہے وہ یہ سوچتے ہیں کہ سمے ہی تو خدا ہے مریم اور ا سے مقدم کی گٹھریوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ رکی ہوئی ساعتوں سے ہٹکر مری لیے اور کیا ہے مریم ابھی بے حد سمے ہے کہ ہم سمے دے ذرا اک دوسرے کو م گر ہم اک ساتھ رہ کر بھی خوش لگ رہ سکے تو معاف کرنا کہ ہے وہ ہے وہ نے بچپن ہی دکھ کی دہلیز پر گزارا ہے وہ ہے وہ ہے وہ ان چراغوں کا دکھ ہوں جن کی لوے شب انتظار ہے وہ ہے وہ بجھ گئی م گر ان سے اٹھنے والا دھواں زمان و مکان ہے وہ ہے وہ پھیلا ہوا ہے اب تک ہے وہ ہے وہ ہے وہ نشان نقش پا اور ان کے جسموں سے بہنے والی ان آبشاروں کا دکھ ہوں جن ک

Tehzeeb Hafi

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طیب حقیقت 9 مجھ سے کہتی تھی سنو جب ہم بڑے ہوں گے ہم اپنا گھر بسائیں گے تو اپنے بیٹے کو ہم پیار سے طیب بلائیں گے ابھی کچھ دن ہی بیتے تھے کہ طیب آ گیا تو اک دن یہ طیب حقیقت نہیں تھا جو میرے خوابوں کا حصہ تھا یہ طیب حقیقت تھا جو اس کا کی یادوں ہے وہ ہے وہ رہتا تھا نہیں سمجھے ہوں جو اب بھی سنو جاناں کو ہے وہ ہے وہ سمجھاؤں ہے وہ ہے وہ ہے وہ اپنی پہلی محبت کا دوجا عشق تھا پیارے سنا ہے اب حقیقت کہتی ہے سنو طیب سنو طیب کہو تو اپنے بیٹے کو آنند پکاریں اب

Anand Raj Singh

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'होप' कैसे तुझ को बतलाऊँ मैं जब भी तुझ सेे मिल कर लौटा कितने तीर चले हैं मुझ पर कितने सपने चाक हुए हैं कैसे मैं ने ख़ुद को समेटा कैसे तुझ सेे ज़ख़्म छुपाएँ लम्हा-लम्हा मौसम-मौसम इक वहशत थी तारी मुझ पर एक चुभन सी साथ थी हर दम लेकिन फिर भी तुझ सेे मिलने हँसते हँसते आ जाता हूँ

ZARKHEZ

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'स्लीपिंग पिल एडिक्शन' काफ़ी देर से शब बेचारी टहल रही है इस कमरे में और मैं बोझल पलकें लेकर लेटे-लेटे कुछ घंटों से घूर रहा हूँ मेज़ पे रखे उस डब्बे को जिसमें मेरी नींद के ज़र्रे पड़े हुए थे कल तक तो मैं अपना हर इक शोरीदा दिन इक ज़र्रे की तह में रख कर पानी के इक घूँट के साथ निगल जाता था लेकिन आज ये बोझल आँखें जाग रही हैं नींद मिरे कमरे का रस्ता भूल चुकी है डब्बा खाली पड़ा हुआ है और मिरा इक शोरीदा दिन मुझ को ज़र्रा-ज़र्रा कर के निगल रहा है

ZARKHEZ

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"द लास्ट गुडबाय" शाम की ख़ामोशी में इज़्तिराब भरने को शोर पैदा करने को उस की कॉल आई है कह रही है वो मुझ से ठीक ही हुआ है सब ख़ुश बहुत हूँ शादी से आख़िरी दफ़ा लेकिन मुझ को तुम से मिलना है सोचता हूँ मैं कह दूँ आख़िरी दफ़ा देखो मिल चुका हूँ मैं पहले और अब के मिल कर भी क्या कहोगी तुम आख़िर फिर वही गिले शिकवे क्या कमी थी रिश्ते में क्यों जुदा हुए थे हम बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसी हो ज़िंदगी बसर कर लो पर मैं हामी भरता हूँ मैं उसे ये कहता हूँ हाँ मैं मिलने आता हूँ इक उदास कैफ़े में इक उदास कैफ़े में आ मिले हैं हम फिर से सामने वो बैठी है चाय पी रहे हैं हम चाय पीते देख उस को था अजब सुकूँ पहले था अजब सुकूँ पहले जब वो हँस के कहती थी मुझ को मिल गए हो तुम मुझ को मिल गया है सब चाय पी रही है वो और मैं ख़यालों में घिर चुका हूँ वहशत से वहशतों से घिर कर मैं सोचने लगा हूँ ये खो दिया उसे मैं ने खो दिया है मैं ने सब अब न चाहने पर भी उस से पूछ बैठा हूँ क्यों जुदा हुए थे हम क्या कमी थी पहले जो पूरी कर चुकी हो तुम आज भी तो देखो ना मेरे सामने हो तुम और वो हँस के कहती है बात मुख़्तसर कर लो तुम जहाँ हो जैसे हो ज़िंदगी बसर कर लो

ZARKHEZ

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بت تراش تمہارے دل نے ہمیشہ مجھ سے شکایتیں کی کہ مری سینے ہے وہ ہے وہ دل نہیں ہے جو دوریاں پ نہیں ہیں ہے وہ ہے وہ ہے وہ چاہتا ہوں کبھی جاناں اپنی شکایتوں کے تمام خنجر مری بدن ہے وہ ہے وہ شریک کر کے بڑے بڑے سے سوراخ کر دو اور ان ہے وہ ہے وہ دیکھو مجھے یقین ہے تمہیں و ہاں اک حیا تکلف جھجھک کا مارا رواج و رسم ج ہاں کا قی گرا ملےگا جو خود شدید فرقت کے پتھروں پر تمہاری صورت احساسات ہے تمہارے بت کو تراشتا ہے

ZARKHEZ

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سوال اداسیوں کے سفر ہے وہ ہے وہ ہے وہ جاناں تمہاری یادوں کے سارے زرے ہے وہ ہے وہ ہے وہ اندرون سے اٹھا اٹھا کر گزشتہ لمحوں کی رہ گزر پر بکھیرتا ہوں خواہش جادہ راحت ہوں جاناں ہی بتاؤ یہ سارے زرے مری ہی دشت وجود کے ہیں یا پھروں تمہاری نمود کے ہیں

ZARKHEZ

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