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Deshbhakti” ke results

Sher

आदमी देश छोड़े तो छोड़े 'अली' दिल में बसता हुआ घर नहीं छोड़ता एक मैं हूँ कि नींदें नहीं आ रही एक तू है कि बिस्तर नहीं छोड़ता

Ali Zaryoun

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

Allama Iqbal

बहुत मुश्किल है कोई यूँँ वतन की जान हो जाए तुम्हें फैला दिया जाए तो हिन्दुस्तान हो जाए

Kumar Vishwas

काम आया तिरंगा कफ़न के लिए कोई क़ुर्बां हुआ था वतन के लिए सोचो क्या कर लिया तुम ने जी कर के दोस्त नस भी काटी तो बस इक बदन के लिए

Neeraj Neer

ऐसा नहीं बस आज तुझे प्यार करेंगे ता'उम्र यही काम लगातार करेंगे सरकार करेगी नहीं इस देश का उद्धार उद्धार करेंगे तो कलाकार करेंगे

Tanoj Dadhich

है नाज़ मुझ को अपनी हिंदी ज़बाँ पे यारो हिंदी हैं हम वतन हैं ये देश सब सेे आला

Dr Mohsin Khan

दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी

Lal Chand Falak

देश मेरा जंग तो जीता मगर लौट कर आया नहीं बेटा मेरा

Divy Kamaldhwaj

कहीं से दुख तो कहीं से घुटन उठा लाए कहाँ-कहाँ से न दीवानापन उठा लाए अजीब ख़्वाब था देखा के दर-ब-दर हो कर हम अपने मुल्क से अपना वतन उठा लाए

Farhat Abbas Shah

लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी

Firaq Gorakhpuri

Nazm

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह

Allama Iqbal

मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए म

Afkar Alvi

दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों

Kumar Vishwas

उर्दू है मिरा नाम मैं 'ख़ुसरव' की पहेली मैं 'मीर' की हमराज़ हूँ 'ग़ालिब' की सहेली दक्कन के 'वली' ने मुझे गोदी में खेलाया 'सौदा' के क़सीदों ने मिरा हुस्न बढ़ाया है 'मीर' की अज़्मत कि मुझे चलना सिखा

Iqbal Ashhar

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया नानक ने जिस चमन में वहदत का गीत गाया तातारियों ने जिस को अपना वतन बनाया जिस ने हिजाज़ियों से दश्त-ए-अरब छुड़ाया मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है यून

Allama Iqbal

निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद क

Faiz Ahmad Faiz

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना पत्थर को गुहर दीवार को दर कर्गस को हुमा क्या लिखना इक हश्र बपा है घर में दम घुटता है गुम्बद-ए-बे-दर में इक शख़्स के हाथों मुद्दत से रुस्वा है व

Habib Jalib

रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नाम राह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम मंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ाम दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भी देख

Chakbast Brij Narayan

तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन जो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करें कितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगा कितने आँसू तिरे सहराओं को गुलज़ार करें तेरे ऐवानों में पुर्ज़े हुए पैमाँ कितने क

Faiz Ahmad Faiz

ये हिन्दोस्ताँ है हमारा वतन मोहब्बत की आँखों का तारा वतन हमारा वतन दिल से प्यारा वतन वो इस के दरख़्तों के तय्यारियाँ वो फल फूल पौदे वो फुल-वारियाँ हमारा वतन दिल से प्यारा वतन हवा में दरख़्तों

Chakbast Brij Narayan

Ghazal

मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे

Tehzeeb Hafi

सब कर लेना लम्हें जाया मत करना ग़लत जगह पर जज्बे जाया मत करना इश्क़ तो निय्यत की सच्चाई देखता है दिल ना दुखे तो सजदे जाया मत करना सादा हूँ और ब्रैंड्स पसंद नहीं मुझ को मुझ पर अपने पैसे जाया

Ali Zaryoun

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था आज सोए हैं तह-ए-ख

Habib Jalib

झूठ से, सच से, जिस सेे भी यारी रखें आप तो अपनी तक़रीर जारी रखें बात मन की कहें या वतन की कहें झूठ बोलें तो आवाज़ भारी रखें इन दिनों आप मालिक हैं बाजार के जो भी चाहें वो कीमत हमारी रखें

Rahat Indori

मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा दश्त मेरा न ये चमन मेरा मैं कि हर चंद एक ख़ाना-नशीं अंजुमन अंजुमन सुख़न मेरा बर्ग-ए-गुल पर चराग़ सा क्या है छू गया था उसे दहन मेरा मैं कि टूटा हुआ सितारा हूँ क्या ब

Ameeq Hanafi

हो गया आप का आगमन नींद में छू कर गुज़री मुझ को जो पवन नींद में मुझ को फूलों की वर्षा में नहला गया मुस्कुराता हुआ इक गगन नींद में कैसे उद्धार होगा मेरे देश का लोग करते है चिंतन मनन नींद में

Azhar Iqbal

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा अपने दिल को भी बताऊँ न ठिकाना तेरा सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है किस के उजड़े हुए दिल म

Dagh Dehlvi

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मिरे यार समझते हैं मुझे जड़ उखड़ने से झुकाव है मिरी शाख़ों में दूर से लोग समर-बार समझते हैं मुझे क्या ख़बर कल यही ताबूत मिरा बन जाए आप जिस तख़्

Shahid Zaki

मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या है बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सित

Mirza Ghalib

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही नहीं विसाल मुयस्सर तो आरज़ू ही सही न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही किसी तरह तो जमें बज़्म मय-कदे वालो नहीं

Faiz Ahmad Faiz