ghazalKuch Alfaaz

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था आज सोए हैं तह-ए-ख़ाक न जाने यहाँ कितने कोई शो'ला कोई शबनम कोई महताब-जबीं था अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को इक ज़माने में मिज़ाज उन का सर-ए-अर्श-ए-बरीं था छोड़ना घर का हमें याद है 'जालिब' नहीं भूले था वतन ज़ेहन में अपने कोई ज़िंदाँ तो नहीं था

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