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“Nature” ke results
Sher
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
Mirza Ghalib
छू लेने दो नाज़ुक होंठों को, कुछ और नहीं हैं जाम हैं ये क़ुदरत ने जो हम को बख़्शा है, वो सब सेे हसीं ईनाम हैं ये
Sahir Ludhianvi
जिस की फ़ितरत ही बे वफ़ाई हो उस सेे उम्मीद-ए-वफ़ा क्या करना
Ajeetendra Aazi Tamaam
तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है क़ुदरत भी मदद फ़रमाती है जब कोशिश-ए-इंसाँ होती है
Hafeez Banarasi
सियासतदार थे वो यार फ़ितरत थी मुकर जाना कि पागल थे लगा बैठे वफ़ा की आरज़ू उन सेे
ATUL SINGH
सभी को है ख़बर याँ उन की फ़ितरत है दग़ा करना बहुत आसान है आशिक़ को इस दिल से जुदा करना दग़ाबाज़ों की महफ़िल से ये इक आवाज़ आई है बहुत दुश्वार है 'दानिश' मुहब्बत में वफ़ा करना
Danish Balliavi
मत देखो आईना, आईने में क्या रक्खा है? तुम को क़ुदरत ने पहले से ही चमका रक्खा है
ZafarAli Memon
लोगों के फेंके पत्थर सहते रहना दरिया की फ़ितरत में है बहते रहना आख़िर शे'र ख़तम कर जाने वाला हूँ अच्छा तुम लोग मुकर्रर कहते रहना
Nirvesh Navodayan
बे-वफ़ाई आदत है बे-हयाई फ़ितरत है मेरे जैसे आशिक़ हैं आशिक़ी पे लानत है
Rakesh Mahadiuree
मत उठाओ मेरी अच्छाई का इतना फ़ाइदा तुम मैं बुरा बन जाऊँ ये फितरत नहीं है मेरी यारों
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
Nazm
उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है मुहब्बत एक फितरत है, हाँ फ़ितरत कब बदलती है सो, जब हम दूर हो जाएँ, नए रिश्तों में खो जाएँ तो ये मत सोच लेना तुम
Mohsin Naqvi
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नाम राह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम मंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ाम दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम इज़हार-ए-बे-कसी से सितम होगा और भी देख
Chakbast Brij Narayan
ऐ ख़ाक-ए-हिंद तेरी अज़्मत में क्या गुमाँ है दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है हर सुब्ह है ये ख़िदमत
Chakbast Brij Narayan
पहले तो हुस्न-ए-अमल हुस्न-ए-यक़ीं पैदा कर फिर इसी ख़ाक से फ़िरदौस-ए-बरीं पैदा कर यही दुनिया कि जो बुत-ख़ाना बनी जाती है इसी बुत-ख़ाने से काबे की ज़मीं पैदा कर रूह-ए-आदम निगराँ कब से है तेरी
Jigar Moradabadi
"वो" वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबा वो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबा किस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कार किस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ार गेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए
Jaun Elia
मशरिक़ का दिया गुल होता है मग़रिब पे सियाही छाती है हर दिल सन सा हो जाता है हर साँस की लौ थर्राती है उत्तर दक्खिन पूरब पच्छिम हर सम्त से इक चीख़ आती है नौ-ए-इंसाँ काँधों पे लिए गाँधी की अर्थी जात
Anand Narayan Mulla
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' अपने फ़न में बड़े हुश्यार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब' आप का नाम असदुल्लाह था नौ-शाह लक़ब मिर्ज़ा ग़ालिब से हुए बा'द में मारूफ़-ए-अदब आज भी पढ़ के कलाम आप का हैरत
Kaif Ahmad Siddiqui
आज फिर तेज बारिश आई और बहा ले गई एक मजदूर की झोपड़ी एक चिड़िया का घोंसला एक किसान का खेत एक दीवार जो कल ही ग़रीब मजदूर औरतों ने तपती धूप में बनाई थी बस नहीं बहा पाई तो भ्रष्टाचार की नींव
Kumar Rishi
"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी ह
ZafarAli Memon
सृजन पेड़ ने अपनी दास्तान किसी पत्ते पर लिखी थोड़ी है या मिट्टी ने अपने नाम का घर बनाया है कहीं कि समुंदर ने छुपा के रखी हो भविष्य के लिए अपने अंदर कुछ नदियाँ नदियाँ जो आई अपना समय छोड़ कर आई पत्त
Murli Dhakad
Ghazal
मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी
Tehzeeb Hafi
ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्
Shabeena Adeeb
वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ क
Deepti Mishra
पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है उस के बा'द ही कुछ कारीगर करता है एक ज़रा सी कश्ती ने ललकारा है अब देखें क्या ढोंग समुंदर करता है कान लगा कर मौसम की बातें सुनिए क़ुदरत का सब हाल उजागर करता है उस की
Madan Mohan Danish
इस नाज़ इस अंदाज़ से तुम हाए चलो हो रोज़ एक ग़ज़ल हम से कहलवाए चलो हो रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो दीवाना-ए-गुल क़ैदी-ए-ज़ंजीर हैं और तुम क्या ठाट से ग
Kaleem Aajiz
हंगामा है क्यूँँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से
Akbar Allahabadi
तन्हा तन्हा मत सोचा कर मर जाएगा मत सोचा कर प्यार घड़ी भर का ही बहुत है झूठा सच्चा मत सोचा कर जिस की फ़ितरत ही डसना हो वो तो डसेगा मत सोचा कर धूप में तन्हा कर जाता है क्यूँ ये साया मत सोचा कर अपना आप
Farhat Shahzad
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है दिल संग-ए-मलामत का हर-चंद नि
Jigar Moradabadi
अगर इंसां की फ़ितरत हम बदलते मुहब्बत बाँटते, आलम बदलते बदलना कुछ हमारे बस में होता तो सब सेे पहले तेरे ग़म बदलते हम अपने सारे लम्हें क़ैद करते हर इक सप्ताह इक अल्बम बदलते हकीम अपना बदलते फिर
Anand Verma
या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन क्यूँँ ख़्वार हैं मर्दान-ए-सफ़ा-केश ओ हुनर-मंद गो इस की ख़ुदाई में महाजन का भी है हाथ दुनिया तो समझती है फ़रंगी को ख़ुदावंद तू बर्ग-ए-गया है न वही अहल-ए-ख़ि
Allama Iqbal