काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है मुझ को ख़बर नहीं मिरी मिट्टी कहाँ की है सुन के मिरा फ़साना उन्हें लुत्फ़ आ गया सुनता हूँ अब कि रोज़ तलब क़िस्सा-ख़्वाँ की है पैग़ाम-बर की बात पर आपस में रंज क्या मेरी ज़बाँ की है न तुम्हारी ज़बाँ की है कुछ ताज़गी हो लज़्ज़त-ए-आज़ार के लिए हर दम मुझे तलाश नए आसमाँ की है जाँ-बर भी हो गए हैं बहुत मुझ से नीम-जाँ क्या ग़म है ऐ तबीब जो पूरी वहाँ की है हसरत बरस रही है हमारे मज़ार पर कहते हैं सब ये क़ब्र किसी नौजवाँ की है वक़्त-ए-ख़िराम-ए-नाज़ दिखा दो जुदा जुदा ये चाल हश्र की ये रविश आसमाँ की है फ़ुर्सत कहाँ कि हम से किसी वक़्त तू मिले दिन ग़ैर का है रात तिरे पासबाँ की है क़ासिद की गुफ़्तुगू से तसल्ली हो किस तरह छुपती नहीं वो बात जो तेरी ज़बाँ की है जौर-ए-रक़ीब ओ ज़ुल्म-ए-फ़लक का नहीं ख़याल तशवीश एक ख़ातिर-ए-ना-मेहरबाँ की है सुन कर मिरा फ़साना-ए-ग़म उस ने ये कहा हो जाए झूट सच यही ख़ूबी बयाँ की है दामन सँभाल बाँध कमर आस्तीं चढ़ा ख़ंजर निकाल दिल में अगर इम्तिहाँ की है हर हर नफ़स में दिल से निकलने लगा ग़ुबार क्या जाने गर्द-ए-राह ये किस कारवाँ की है क्यूँँकि न आते ख़ुल्द से आदम ज़मीन पर मौज़ूँ वहीं वो ख़ूब है जो सुनते जहाँ की है तक़दीर से ये पूछ रहा हूँ कि इश्क़ में तदबीर कोई भी सितम-ए-ना-गहाँ की है उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़' हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है
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کیسے ا سے نے یہ سب کچھ مجھ سے چھپ کر بدلا چہرہ بدلا رستہ بدلا بعد ہے وہ ہے وہ گھر بدلا ہے وہ ہے وہ ہے وہ ا سے کے بارے ہے وہ ہے وہ یہ کہتا تھا لوگوں سے میرا نام بدل دینا حقیقت بے وجہ ا گر بدلا حقیقت بھی خوش تھا ا سے نے دل دے کر دل مانگا ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ بھی خوش ہوں ہے وہ ہے وہ نے پتھر سے پتھر بدلا ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے کہا کیا مری خاطر خود کو بدلوگے اور پھروں ا سے نے نظریں بدلیں اور نمبر بدلا
Tehzeeb Hafi
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حقیقت بےوفا ہے تو کیا مت کہو برا اس کا کو کہ جو ہوا سو ہوا خوش رکھے خدا اس کا کو نظر لگ آئی تو ا سے کی تلاش ہے وہ ہے وہ رہنا کہی ملے تو پلٹ کر لگ دیکھنا اس کا کو حقیقت سادہ خوں تھا زمانے کے خم سمجھتا کیا ہوا کے ساتھ چلا لے اڑی ہوا اس کا کو حقیقت اپنے بارے ہے وہ ہے وہ کتنا ہے خوش گماں دیکھو جب اس کا کو ہے وہ ہے وہ بھی لگ دیکھوں تو دیکھنا اس کا کو
Naseer Turabi
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اسی جگہ پر ج ہاں کئی راستے ملیںگے پلٹ کے آئی تو سب سے پہلے تجھے ملیںگے ا گر کبھی تری نام پر جنگ ہوں گئی تو ہم ایسے بزدل بھی پہلی صف ہے وہ ہے وہ کھڑے ملیںگے تجھے یہ سڑکیں مری توسط سے جانتی ہیں تجھے ہمیشہ یہ سب اشارے کھلے ملیںگے
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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یہی اپنی کہانی تھی میاں پہلے بے حد پہلے حقیقت لڑکی جاں ہماری تھی میاں پہلے بے حد پہلے وہم مجھ کو یہ بھاتا ہے,अभी مری دیوانی ہے م گر مری دیوانی تھی میاں پہلے بے حد پہلے رقیب آ کر بتاتے ہیں ی ہاں تل ہے و ہاں تل ہے ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ یہ جانکاری تھی میاں پہلے بے حد پہلے ادب سے مانگ کر مافی بھری محفل یہ کہتا ہوں حقیقت لڑکی خاندانی تھی میاں پہلے بے حد پہلے
Anand Raj Singh
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راہ پر ان کو لگا لائے تو ہیں باتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ اور کھل جائیں گے دو چار ملاقاتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ یہ بھی جاناں جانتے ہوں چند ملاقاتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ آزمایا ہے تمہیں ہم نے کئی باتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ غیر کے سر کی بلائیں جو نہیں لیں ظالم کیا مری قتل کو بھی جان نہیں ہاتھوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ابر رحمت ہی برستا نظر آیا زاہد خاک اڑتی کبھی دیکھی لگ خراباتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ یارب ا سے چاند کے ٹکڑے کو ک ہاں سے لاؤں روشنی ج سے کی ہوں ان تاروں بھری راتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ تمہیں انصاف سے اے حضرت ناصح کہ دو لطف ان باتوں ہے وہ ہے وہ آتا ہے کہ ان باتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ دوڑ کر دست دعا ساتھ دعا کے جاتے ہاں یہ پیدا لگ ہوئے پاؤں مری ہاتھوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ جلوہ یار سے جب بزم ہے وہ ہے وہ نور صفا آیا ہے تو رقیبوں نے سنبھالا ہے مجھے ہاتھوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ایسی تقریر سنی تھی لگ کبھی شوخ و شریر تیری آنکھوں کے بھی فتنے ہیں تری باتوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہم سے انکار ہوا غیر سے اقرار ہوا فیصلہ خوب کیا آپ نے دو
Dagh Dehlvi
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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
Dagh Dehlvi
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बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया अफ़्साना आशिक़ों का फ़क़त याद रह गया ये सख़्त-जाँ तो क़त्ल से नाशाद रह गया ख़ंजर चला तो बाज़ू-ए-जल्लाद रह गया पाबंदियों ने इश्क़ की बेकस रखा मुझे मैं सौ असीरियों में भी आज़ाद रह गया चश्म-ए-सनम ने यूँँ तो बिगाड़े हज़ार घर इक का'बा चंद रोज़ को आबाद रह गया महशर में जा-ए-शिकवा किया शुक्र यार का जो भूलना था मुझ को वही याद रह गया उन की तो बन पड़ी कि लगी जान मुफ़्त हाथ तेरी गिरह में क्या दिल-ए-नाशाद रह गया पुर-नूर हो रहेगा ये ज़ुल्मत-कदा अगर दिल में बुतों का शौक़-ए-ख़ुदा-दाद रह गया यूँँ आँख उन की कर के इशारा पलट गई गोया कि लब से हो के कुछ इरशाद रह गया नासेह का जी चला था हमारी तरह मगर उल्फ़त की देख देख के उफ़्ताद रह गया हैं तेरे दिल में सब के ठिकाने बुरे भले मैं ख़ानुमाँ-ख़राब ही बर्बाद रह गया वो दिन गए कि थी मिरे सीने में कुछ ख़राश अब दिल कहाँ है दिल का निशाँ याद रह गया सूरत को तेरी देख के खिंचती है जान-ए-ख़ल्क़ दिल अपना थाम थाम के बहज़ाद रह गया ऐ 'दाग़' दिल ही दिल में घुले ज़ब्त-ए-इश्क़ से अफ़्सोस शौक़-ए-नाला-ओ-फ़रियाद रह गया
Dagh Dehlvi
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ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएँ हम दिल ख़ून में नहाए तो गंगा नहाएँ हम जन्नत में जाएँ हम कि जहन्नम में जाएँ हम मिल जाए तो कहीं न कहीं तुझ को पाएँ हम जौफ़-ए-फ़लक में ख़ाक भी लज़्ज़त नहीं रही जी चाहता है तेरी जफ़ाएँ उठाएँ हम डर है न भूल जाए वो सफ़्फ़ाक रोज़-ए-हश्र दुनिया में लिखते जाते हैं अपनी ख़ताएँ हम मुमकिन है ये कि वादे पर अपने वो आ भी जाए मुश्किल ये है कि आप में उस वक़्त आएँ हम नाराज़ हो ख़ुदा तो करें बंदगी से ख़ुश माशूक़ रूठ जाए तो क्यूँँकर मनाएँ हम सर दोस्तों का काट के रखते हैं सामने ग़ैरों से पूछते हैं क़सम किस की खाएँ हम कितना तिरा मिज़ाज ख़ुशामद-पसंद है कब तक करें ख़ुदा के लिए इल्तिजाएँ हम लालच अबस है दिल का तुम्हें वक़्त-ए-वापसीं ये माल वो नहीं कि जिसे छोड़ जाएँ हम सौंपा तुम्हें ख़ुदा को चले हम तो ना-मुराद कुछ पढ़ के बख़्शना जो कभी याद आएँ हम सोज़-ए-दरूँ से अपने शरर बन गए हैं अश्क क्यूँँ आह-ए-सर्द को न पतिंगे लगाएँ हम ये जान तुम न लोगे अगर आप जाएगी उस बे-वफ़ा की ख़ैर कहाँ तक मनाएँ हम हम-साए जागते रहे नालों से रात भर सोए हुए नसीब को क्यूँँकर जगाएँ हम जल्वा दिखा रहा है वो आईना-ए-जमाल आती है हम को शर्म कि क्या मुँह दिखाएँ हम मानो कहा जफ़ा न करो तुम वफ़ा के बा'द ऐसा न हो कि फेर लें उल्टी दुआएँ हम दुश्मन से मिलते जुलते हैं ख़ातिर से दोस्ती क्या फ़ाएदा जो दोस्त को दुश्मन बनाएँ हम तू भूलने की चीज़ नहीं ख़ूब याद रख ऐ 'दाग़' किस तरह तुझे दिल से भुलाएँ हम
Dagh Dehlvi
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دل کو کیا ہوں گیا تو خدا جانے کیوں ہے ایسا ادا سے کیا جانے اپنے غم ہے وہ ہے وہ بھی ا سے کو صرفہ ہے لگ کھلا جانے حقیقت لگ کھا جانے ا سے عارفا لگ کا کیا ہری ہے جان کر جو لگ مدعا جانے کہ دیا ہے وہ ہے وہ نے راز دل اپنا ا سے کو جاناں جانو یا خدا جانے کیا غرض کیوں ادھر برق ہوں حال دل آپ کی بلا جانے جانتے جانتے ہی جانےگا مجھ ہے وہ ہے وہ کیا ہے ابھی حقیقت کیا جانے کیا ہم ا سے بد گماں سے بات کریں جو ستائش کو بھی گلہ جانے جاناں لگ پاؤگے سادہ دل مجھ سا جو ت غافل کو بھی حیا جانے ہے عبث جرم عشق پر الزام جب اعتباری وار بھی غلطیاں جانے نہیں کوٹاہ دامن امید آگے اب دست نا رسا جانے جو ہوں اچھا ہزار اچھوں کا واعظ ا سے بت کو تو برا جانے کی مری دودمان مثل شاہ دکن کسی نواب نے لگ راجا نے ا سے سے اٹھےگی کیا مصیبت عشقابتدا کو جو انتہا جانے داغ سے کہ دو اب لگ گھبراؤ کام اپنا بتا ہوا جانے
Dagh Dehlvi
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