nazmKuch Alfaaz

“ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो” ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो स्वजन हो साथी हो बोलो आख़िर तुम कौन हो अगर हो आशिक़ मेरी तो फिर तुम अबतक क्यूँँ मौन हो निश्चित ही तुम मोहब्बत के इज़हार से डरती हो जब कहने में इतनी दिक़्क़त है तो प्यार क्यूँँ करती हो कहीं डरती तुम उस न से तो नहीं जो बयान-ए-इश्क़ पे सुनना पड़े मोहब्बत भी पूरी न हो और नया साथी भी ढूँढ़ना पड़े पर ये भी तो सच है ना मोहब्बत में दोस्ती सराब है इक बार मोहब्बत हो जाए तो बस दोस्त रह पाना ख़्वाब है ख़ैर छोड़ो ये फ़िज़ूल की बातें चलो बस इतना ही बता दो क्यूँँ कर बैठी मोहब्बत मुझ सेे इस राज़ से तो पर्दा हटा दो सीधा दिल ही लगा बैठी मुझ में ऐसा भी क्या देख लिया तुम ने जो ख़ूबियाँ तुम ने देखी हैं काश! कभी तो देखा होता उस ने अब पढ़ ही लिया है आँखों को मेरी तो क्यूँँ न मुझ पर एक एहसान कर दो जिस नज़रिए से तुम ने देखा है मुझे वो सलीक़ा उस को दान कर दो वो पढ़ सके दिल को मेरे ये अज़ीज़ हुनर तुम उसे भी सीखा दो इस फ़रेब-ए-दुनिया के अँधेरे में एक रौशनी मोहब्बत की तुम उसे दिखा दो माना कि मैं लड़का हूँ पर ज़िन्दगी मेरी भी आसान नहीं कभी देखो ग़ौर से चेहरे को मेरे इस पे पहले-सी वो मुस्कान नहीं अब तुम ही कोई चमत्कार दिखा दो इस राँझे की मुस्कान लौटा दो ढूँढ़ कर तुम पता कहीं से मेरी हीर को मेरा हाल बता दो वो मिल जाए तुम्हें तो अच्छा है न मिले तब भी कोई गिला नहीं तुम लौट जाना घर को अपने सोचना मैं तुम सेे कभी मिला नहीं समझकर इक फ़िज़ूल ख़्वाब तुम इस अनचाह क़िस्से को भुला देना घोंटकर गला जज़्बात का अपने अरमानों को तुम सुला देना बड़ी मुश्किल से सॅंभाला है ख़ुद को मुझे दोबारा तोड़ने न आना कहीं और दिल लगा लेना तुम मुझ सेे रिश्ता जोड़ने न आना जिस मिलन की तुम को हसरत है वो मिलन कदाचित सम्भव नहीं दिल लगाने को बेचैन हो तुम तुम्हें दिल टूटने का अनुभव नहीं ये दोबारा दिल लगाने का हुनर मुझे रास नहीं आता टूटे दिल को मोहब्बत का अब कोई एहसास नहीं भाता कैसे हाँ कह दूँ मैं तुम को जब दिल में मेरे कोई आहट नहीं बस तुम्हारी ख़ुशी को ख़ुदा मान लूँ क्या मेरी अपनी कोई चाहत नहीं मोहब्बत से मैं समझौता कर लूँ नहीं मुझ को ये मंज़ूर कभी बस दिल बहलाने को दिल लगा लूँ नहीं इतना मैं मजबूर अभी माना कि हूँ थोड़ा टूटा मगर किसी हमदर्दी की चाहत नहीं तुम्हारा होना भी एक डर है इस मौजूदगी से मुझे कोई राहत नहीं बस भी करो यूँँ याद करना मुझे ये मुसलसल हिचकियाँ अब सही नहीं जातीं बे-दर्द ये बे-रुख़ी बातें बार-बार मुझ सेे अब कही नहीं जातीं न जाने क्यूँँ मेरी ख़ातिर तुम अपनों से फ़साद करती हो मुझ काफ़िर के इश्क़ में ख़ुद को क्यूँँ नाशाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो अपना कीमती वक़्त क्यूँँ मुझ पर यूँँ बर्बाद करती हो ऐ अजनबी क्यूँँ बार-बार तुम मुझे याद करती हो

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ا سے سے محبت جھیلیں کیا ہیں ا سے کی آنکھیں عمدہ کیا ہے ا سے کا چہرہ خوشبو کیا ہے ا سے کی سانسیں خوشیاں کیا ہیں ا سے کا ہونا تو غم کیا ہے ا سے سے جدائی ساون کیا ہے ا سے کا رونا سر گرا کیا ہے ا سے کی اداسی گرمی کیا ہے ا سے کا غصہ اور بہاریں ا سے کا ہنسنا میٹھا کیا ہے ا سے کی باتیں کڑوا کیا ہے مری باتیں کیا پڑھنا ہے ا سے کا لکھا کیا سننا ہے ا سے کی غزلیں لب کی خواہش ا سے کا ماتھا زخم کی خواہش ا سے کا چھونا دنیا کیا ہے اک جنگل ہے اور جاناں کیا ہوں پیڑ سمجھ لو اور حقیقت کیا ہے اک راہی ہے کیا سوچا ہے ا سے سے محبت کیا کرتے ہوں ا سے سے محبت زار پیشہ ا سے سے محبت ا سے کے علاوہ ا سے سے محبت ا سے سے محبت

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا

Jaun Elia

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یاد ہے پہلے روز کہا تھا یاد ہے پہلے روز کہا تھا پھروں نہ کہنا غلطی دل کی پیار سمجھ کے کرنا لڑکی پیار نبھانا ہوتا ہے پھروں پار لگانا ہوتا ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا ساتھ چلو تو پورے سفر تک مر جانے کی اگلی خبر تک سمجھو یار خدا تک ہوگا سارا پیار وفا تک ہوگا پھروں یہ بندھن توڑ نہ جانا چھوڑ گئے تو پھروں نہ آنا چھوڑ دیا جو تیرا نہیں ہے چلا گیا جو میرا نہیں ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا یا تو ٹوٹ کے پیار نہ کرنا یا پھروں پیٹھ پہ وار نہ کرنا جب نادانی ہو جاتی ہے نئی کہانی ہو جاتی ہے نئی کہانی لکھ لاوں گا اگلے روز میں بک جاؤں گا تیرے گل جب کھیل جائیں گے مجھ کو پیسے مل جائیں گے یاد ہے پہلے روز کہا تھا بچھڑ گئے تو موج اڑانا واپس میرے پاس نہ آنا جب کوئی جا کر واپس آئے روئے تڑپے یا پچھتائے میں پھروں اس کو ملتا نہیں ہوں ساتھ دوبارہ چلتا نہیں ہوں گم جاتا ہوں کھو جاتا ہوں میں پتھر کا ہو جاتا ہوں

Khalil Ur Rehman Qamar

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دو جانب ایک ہے وہ ہے وہ ہوں ایک تو ہے دونوں بڑے نادان ہیں تو مجھ سے اور ہے وہ ہے وہ خود سے دونوں ہی انجان ہیں تیری گلیاں سورگ ہیں چنو میرا شہر شمشان ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ شمع کب سے بجھا ہوا تجھ پر پتنگیں قربان ہیں خوشیاں تری قدم چومتیں غم مری مہمان ہیں تجھ پر خدا فدا ہے مجھ سے گھر والے تک پریشان ہیں مجھے کہ ب سے اک خواہش تیری تجھے کہ سیکڑوں ارمان ہیں مری قسمت ہے وہ ہے وہ تو ہی نہیں تجھ پر قسمت مہربان ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ تری لیے کچھ بھی نہیں تو مری لیے بھگوان ہے تری دل ہے وہ ہے وہ بھلے ریحان لگ ہوں تیری زندگی پھروں بھی ریحان ہے

Rehaan

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سنو ہے وہ ہے وہ گھر واپ سے آ رہا ہوں اچھا تمہیں ایک خبر سنا رہا ہوں سنو ہے وہ ہے وہ گھر واپ سے آ رہا ہوں ملائے گا نو دنوں کی چھٹیاں ملی ہیں م گر چھٹیاں تو قاف یوں ایک بہانا ہے اصل ہے وہ ہے وہ تو جاناں سے ملنا چاہتا ہوں تمہیں رو برو دیکھنا چاہتا ہوں اک دفع پھروں با ہوں ہے وہ ہے وہ بھرنا چاہتا ہوں اصل ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ تھوڑا سا تھک گیا تو ہوں تمہاری گود ہے وہ ہے وہ کچھ دیر سونا چاہتا ہوں سفر کی دھوپ ہے وہ ہے وہ بے حد جل چکا ہوں ذرا زلفوں کی پناہ ہے وہ ہے وہ رہنا چاہتا ہوں انجان را ہوں پہ بڑا بھٹک لیا ہوں تمہارے دل کے مکان ہے وہ ہے وہ ٹھہرنا چاہتا ہوں ب سے نو ہی دن ملے ہیں مجھے مریم ہر پل تمہارے ساتھ گزار لگ چاہتا ہوں اور چاہتا ہوں کہ میرا انتظار کرنا ٹھیک ویسے ہی ان حسین شاموں کی طرح اسی سفید بڑھاؤں گا اور کرتی ہے وہ ہے وہ سنورنا اور گلے ہے وہ ہے وہ لہراتا وہی سرخ دوپٹہ اپنی چھت کی منڈیر پر جاناں کھڑی رہنا گزرونگا جب ہے وہ ہے وہ گلی سے تمہاری تو روکنا لگ خود کو جاناں مسکرانے سے م گر ا سے بار پھیر لوں گا نظ

Rehaan

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جاناں پوچھتے ہوں کہ حقیقت کیا ہے جاناں پوچھتے ہوں کہ حقیقت کیا ہے کیوں ا سے پر دل میرا یوں فدا ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ کرتا ہوں ب سے باتیں اسی کی جانے مجھے یہ ہوں کیا گیا تو ہے مری غزل شاعری ہے وہ ہے وہ ب سے نام اسی کا حقیقت رادھا اور ہے وہ ہے وہ ب سے شیام اسی کا لگے ہے جگ جھوٹا ب سے حقیقت ہی ایک سچی صورت کہ چنو کوئی معصوم سی بچی حقیقت ہنسے تو ہونٹوں سے پھول جھرے نگاہیں ب سے اسی کو ڈھونڈا کریں حقیقت دیکھے تو لگتے حسین لمحات ہیں سنواردے جب زلفیں تو کیا بات ہے حقیقت جان ہے مری حقیقت مری چھڑکو ہے تعریفیں جتنی بھی کروں ا سے کی کم ہیں حقیقت ستاروں کا آ سماں حقیقت بہاروں کا گلستاں حقیقت پونم کی چاندنی کوئی دلکش سی راگنی حقیقت جاڑے کی دھوپ حقیقت اپسرا کا سروپ حقیقت تاکتے کی غزل حقیقت رادھا سی سہل حقیقت سرسوتی کی وینا اور میرا کا ایکتارا حقیقت گنگا سی پاون اور یمنا کی دھارا حقیقت پریوں کی رانی حقیقت سنگم کا پانی حقیقت تلسی سی پوتر ا سے کا سیتا سا چریتر حقیقت ذرہ سر زمین گوکول کی تان حقیقت ویدوں کا گیان حقیقت پھولوں سی

Rehaan

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بن تری مجھے جینا ہے بن تری یہ سچ اپنا نہیں سکتا بچھڑ کر تجھ سے واپ سے خود کو بھی اب پا نہیں سکتا محبت ایک ایسا غم ہے جو سب کو رلاتا ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ کتنا رویا تڑپا ہوں تجھے سمجھا نہیں سکتا تیری ہر یاد کانٹوں کی طرح دل کو دکھاتی ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ کتنے درد ہے وہ ہے وہ ہوں یہ تجھے بتلا نہیں سکتا تیرا چہرہ مری آنکھوں ہے وہ ہے وہ اب ہر پل جھلکتا ہے تری خوابوں ہے وہ ہے وہ ہی جاناں میرا ہر دن گزرتا ہے بھلے تجھ سے لگ کہ پایا ہے وہ ہے وہ اپنے دل کی باتیں پر ہے وہ ہے وہ ہے وہ کتنا چاہتا ہوں تجھ کو میرا دل سمجھتا ہے خدا سے اب یہ خواہش ہے کہ تو ب سے مری ہوں جائے تری بن جینا ناممکن یہ دل تجھ پہ ہی مرتا ہے

Rehaan

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ضروری تھا بھولنہ بھی تھا ضروری تجھے تو ا سے لیے پھروں عشق ہے وہ ہے وہ جلتے چراغوں کو بجھایا ہم نے سوچ کر یہ کہ تیری یاد نہیں لازم اب دل سے اپنے تیری یادوں کو ہٹایا ہم نے محبت کے ملالوں سے ابرنا بھی ضروری تھا مرادیں بھی ضروری تھیں سمجھنا بھی ضروری تھا ضروری تھا کہ یادوں کو سنبھالے رکھتے دل ہے وہ ہے وہ ہم مگر یادوں کا پھروں دل سے نکلنا بھی ضروری تھا ہیں ہم کو یاد شا ہے وہ ہے وہ ہے وہ جو تیری گلیوں ہے وہ ہے وہ بیتی تھیں ہمارا دل جہاں ہارا تھا نظریں تیری جیتی تھیں حقیقت تیرا ہم کو شہر جان جاں دیکھنا کیول بہانا تھا اصل ہے وہ ہے وہ تو تیرا مقصد ہمارا دل دکھانا تھا مگر ہم دیر سے سمجھے ادائیں حقیقت نمائش تھیں تیری گلیوں سے بن دیکھے گزرنا بھی ضروری تھا کسی منزل سفر کی اب نہیں رہتی خبر ہم کو کوئی امید کی لو بھی نہیں آتی نظر ہم کو محبت کی غلطیاں کی تھی سزائیں پانی تھی پا لیں کیے کتنے ستم خود پہ کہ کتنی ٹھوکریں کھا لیں تیرے غم کے ستائیں ہم کبھی روئے کبھی تڑپے مگر تڑپے تو یاد آیا تڑپنا بھی ضروری تھا

Rehaan

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