nazmKuch Alfaaz

چناب ہوئے پروش پریم ہے وہ ہے وہ چناب ہوئے کچھ پروش پروش نہیں رہتے حقیقت ہوں جاتے ہیں ستری حقیقت خود کو بھر لیتے ہیں بھاوکتا اور آنسو سے پریم ہے وہ ہے وہ چناب پروش پرابت کر کر لیتے ستریتو کے اس کا گن کو جس ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہوتا ہے میرا سا پاگل پن رادھا سا نہہسوارٹھ پریم حقیقت چنتے ہیں میرا یا رادھا ہوں جانا یا ہوں جانا دونوں ہی دونوں ہوں جانا اتیہدھک دہکھد ہے اسے سہن کرنی ہوتی ہیں تب دونوں ہی پیڑا رادھا جس کے بغیر کرشن نام ادھورا ہے پرنتو پھروں بھی رادھا کے حصے آتا ہے ویوگی جیون اور حقیقت چن لیتی ہے کرشن کی یادوں کے ساتھ جیون نرواہ میرا جس کے بغیر کرشن کوئی بھگوان نہیں اور میرا کو ملتا ہے ترسکرت جیون اور آخری سواںس تک حقیقت چنتی ہے کرشن بھکتی دونوں ہی بےباک پریم کی پریائے ہیں جو بتاتا ہے اتھاہ یا نہہسوارٹھ پریم سدیو ایک طرفہ رہا ہے حقیقت نہیں پرابت کر پاتا رکمنی ہونا رادھا کی مائل میرا نے نہیں سویقار کیا پریمکا بنے رہنا اور اس کا نے کرشن کو سگے کہا رادھا ہوں جانا دہکھد تو ہے میرا ہوں جانا اتین

Related Nazm

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

نجم اک بر سے اور کٹ گیا تو شریک روز سانسوں کی جنگ لڑتے ہوئے سب کو اپنے خلاف کرتے ہوئے یار کو بھولنے سے ڈرتے ہوئے اور سب سے بڑا غصہ ہے یہ سانسیں لینے سے دل نہیں بھرتا اب بھی مرنے کو جی نہیں کرتا

Shariq Kaifi

46 likes

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا

Jaun Elia

216 likes

کیوں الجھا الجھا رہتے ہوں کچھ بولو تو کچھ بات کروں کیا اب بھی تنہا راتیں ہیں کیا درد ہی دل بہلاتے ہیں کیوں محفل را سے نہیں آتی کیوں کوئل گیت نہیں گاتی کیوں پھولوں سے خوشبو گم ہے کیوں بھونرا گم سم گم سم ہے ان باتوں کا کیا زار ہے کچھ بولو تو کچھ بات کروں کیوں اماں کی کم سنتے ہوں کیا بھیتر بھیتر گنتے ہوں کیوں ہنسنا رونا بھول گئے کیوں لکڑی چنو گھنتے ہوں کیا دل کو کہی لگائے ہوں کیا عشق ہے وہ ہے وہ دھوکہ کھائے ہوں کیا ایسا ہی کچھ مسئلہ ہے کچھ بولو تو کچھ بات کروں

Raghav Ramkaran

42 likes

More from Navneet Vatsal Sahil

"नाकाम कोशिश" कभी कभी ऐसा भी होता है अक्सर सिगरेट सुलगाकर भूल जाता हूँ मैं और चला जाता हूँ उस बीते हुए वक़्त में हमारी साथ बिताई यादों को समेटने सब कुछ समेटने की नाकाम कोशिश करता हुआ मैं भूल जाता हूँ सिगरेट ! उँगली जला चुकी होती है तब तक

Navneet Vatsal Sahil

3 likes

हिज्र की रातें हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं हिज्र की रातें साँप होती हैं सियाह काले साँप जो शाम ढले बाहर निकलते हैं यादों के बिल से और शुरू कर देते हैं डसना ज़हर जब चढ़ने लगता है जिस्म ठंडा पड़ने लगता है धड़कन कभी इतनी तेज़ कि कमरा गूँजने लग जाए कभी इतनी धीमी कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए साँसें इतनी बेचैन मानो दिया बुझने को हो और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का दर्द ऐसा दिल में ख़ून के क़तरे आँखों से निकलने लगते हैं पर मौत नहीं आती यका यक आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं हर एक ख़्वाहिश और एहसास को मारते हुए अंदरू लाश बनाते हुए हिज्र की रातें साँप होती हैं हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं

Navneet Vatsal Sahil

0 likes

اک جادوئی لفظ نا آپ تھا نا جاناں تھا نا تو تھا کبھی نام نہیں لیے ہم نے ایک دوسرے کے پھروں بھی کتنی باتیں ہوتیں تھیں اک لفظ تھا لفظ کیا تھا جان جان اور جان تھا یہ لفظ قاف یوں اک لفظ نہیں تھا ا سے اک لفظ ہے وہ ہے وہ کتنا کچھ تھا ا سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ حقیقت سب کچھ تھا جو ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ایک دوسرے سے چاہیے تھا ا سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ حقیقت سارے وعدے تھے جو لوگ ملتے سمے کرتے ہیں حقیقت ساری ق سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ تھیں جو بچھڑتے سمے کے لیے تھیں یہ لفظ قاف یوں اک لفظ نہیں تھا ا سے اک لفظ ہے وہ ہے وہ کتنا کچھ تھا جانتے ہوں دوست یہ لفظ قاف یوں واقعہ ہی نا تھا ایک خوشبوؤں تھا پورا ہماری محبت کا یہ اک ایسا لفظ تھا ج سے ہے وہ ہے وہ سانسیں تھیں جو اکیلا سارے ٹھنڈے لفظوں کے بیچ گرم تھا زندہ لفظ تھا اک وہی تو گواہ تھا ہم محبت ہے وہ ہے وہ کتنے سچے تھے ایک ایسا لفظ جسے بولتے ہوئے اپنا بدن سرسرا کی قباء لگتی پیڑ ناچتے لگتے اور ہوا بہکتی لگتی یہ لفظ قاف یوں اک لفظ نہیں تھا ا سے اک لفظ ہے

Navneet Vatsal Sahil

4 likes

دھیما زہر درجے زندگی جینے کو اہم تو ہیں م گر یہ دھیما زہر ہوتی ہیں گر ہوں جائیں زیادہ تو ختم کر دیتی ہیں دھیرے دھیرے خوشیوں کو پالنے والے انسان کو آخرش ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے بھی مری جاناں جاناں سے رکھی تھیں امیدیں جاناں سے پالی تھیں خواہشیں اول روتی روتی کی امیدیں اول روتی روتی کی خواہشیں اور اب یہ حال ہے جاناں خوشیوں کی راکھ پر زندگی نفعے دھیمی موت مر رہی ہے جاناں جاناں نے مجھ کو سکھلایا ہے درجے زہر ہوتی ہیں

Navneet Vatsal Sahil

3 likes

رونا ضبط ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ پوچھتا ہوں خدا سے حقیقت خدا جو سبکا ہے میرا نہیں یہ ا پیش بات ہے جاناں جاناں بھی خدا ہی تھیں مجھے ا سے لیے شاید اب میرا کوئی بھی تو خدا نہیں پھروں بھی پوچھتا ہوں کیا یہ لوگ کبھی نہیں روئیں گے کسی روز ان کے چشمے تر نہیں ہوں گے ہے وہ ہے وہ ہے وہ پوچھوں گا ا سے روز جب ان کا اپنا ان سے چھن جائےگا روتے کیوں ہوں رونا ضبط ہے

Navneet Vatsal Sahil

4 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Navneet Vatsal Sahil.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Navneet Vatsal Sahil's nazm.