چناب ہوئے پروش پریم ہے وہ ہے وہ چناب ہوئے کچھ پروش پروش نہیں رہتے حقیقت ہوں جاتے ہیں ستری حقیقت خود کو بھر لیتے ہیں بھاوکتا اور آنسو سے پریم ہے وہ ہے وہ چناب پروش پرابت کر کر لیتے ستریتو کے اس کا گن کو جس ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہوتا ہے میرا سا پاگل پن رادھا سا نہہسوارٹھ پریم حقیقت چنتے ہیں میرا یا رادھا ہوں جانا یا ہوں جانا دونوں ہی دونوں ہوں جانا اتیہدھک دہکھد ہے اسے سہن کرنی ہوتی ہیں تب دونوں ہی پیڑا رادھا جس کے بغیر کرشن نام ادھورا ہے پرنتو پھروں بھی رادھا کے حصے آتا ہے ویوگی جیون اور حقیقت چن لیتی ہے کرشن کی یادوں کے ساتھ جیون نرواہ میرا جس کے بغیر کرشن کوئی بھگوان نہیں اور میرا کو ملتا ہے ترسکرت جیون اور آخری سواںس تک حقیقت چنتی ہے کرشن بھکتی دونوں ہی بےباک پریم کی پریائے ہیں جو بتاتا ہے اتھاہ یا نہہسوارٹھ پریم سدیو ایک طرفہ رہا ہے حقیقت نہیں پرابت کر پاتا رکمنی ہونا رادھا کی مائل میرا نے نہیں سویقار کیا پریمکا بنے رہنا اور اس کا نے کرشن کو سگے کہا رادھا ہوں جانا دہکھد تو ہے میرا ہوں جانا اتین
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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نجم اک بر سے اور کٹ گیا تو شریک روز سانسوں کی جنگ لڑتے ہوئے سب کو اپنے خلاف کرتے ہوئے یار کو بھولنے سے ڈرتے ہوئے اور سب سے بڑا غصہ ہے یہ سانسیں لینے سے دل نہیں بھرتا اب بھی مرنے کو جی نہیں کرتا
Shariq Kaifi
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا
Jaun Elia
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کیوں الجھا الجھا رہتے ہوں کچھ بولو تو کچھ بات کروں کیا اب بھی تنہا راتیں ہیں کیا درد ہی دل بہلاتے ہیں کیوں محفل را سے نہیں آتی کیوں کوئل گیت نہیں گاتی کیوں پھولوں سے خوشبو گم ہے کیوں بھونرا گم سم گم سم ہے ان باتوں کا کیا زار ہے کچھ بولو تو کچھ بات کروں کیوں اماں کی کم سنتے ہوں کیا بھیتر بھیتر گنتے ہوں کیوں ہنسنا رونا بھول گئے کیوں لکڑی چنو گھنتے ہوں کیا دل کو کہی لگائے ہوں کیا عشق ہے وہ ہے وہ دھوکہ کھائے ہوں کیا ایسا ہی کچھ مسئلہ ہے کچھ بولو تو کچھ بات کروں
Raghav Ramkaran
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"नाकाम कोशिश" कभी कभी ऐसा भी होता है अक्सर सिगरेट सुलगाकर भूल जाता हूँ मैं और चला जाता हूँ उस बीते हुए वक़्त में हमारी साथ बिताई यादों को समेटने सब कुछ समेटने की नाकाम कोशिश करता हुआ मैं भूल जाता हूँ सिगरेट ! उँगली जला चुकी होती है तब तक
Navneet Vatsal Sahil
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हिज्र की रातें हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं हिज्र की रातें साँप होती हैं सियाह काले साँप जो शाम ढले बाहर निकलते हैं यादों के बिल से और शुरू कर देते हैं डसना ज़हर जब चढ़ने लगता है जिस्म ठंडा पड़ने लगता है धड़कन कभी इतनी तेज़ कि कमरा गूँजने लग जाए कभी इतनी धीमी कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए साँसें इतनी बेचैन मानो दिया बुझने को हो और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का दर्द ऐसा दिल में ख़ून के क़तरे आँखों से निकलने लगते हैं पर मौत नहीं आती यका यक आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं हर एक ख़्वाहिश और एहसास को मारते हुए अंदरू लाश बनाते हुए हिज्र की रातें साँप होती हैं हिज्र की रातें रातें नहीं होतीं
Navneet Vatsal Sahil
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اک جادوئی لفظ نا آپ تھا نا جاناں تھا نا تو تھا کبھی نام نہیں لیے ہم نے ایک دوسرے کے پھروں بھی کتنی باتیں ہوتیں تھیں اک لفظ تھا لفظ کیا تھا جان جان اور جان تھا یہ لفظ قاف یوں اک لفظ نہیں تھا ا سے اک لفظ ہے وہ ہے وہ کتنا کچھ تھا ا سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ حقیقت سب کچھ تھا جو ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ایک دوسرے سے چاہیے تھا ا سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ حقیقت سارے وعدے تھے جو لوگ ملتے سمے کرتے ہیں حقیقت ساری ق سے ہے وہ ہے وہ ہے وہ تھیں جو بچھڑتے سمے کے لیے تھیں یہ لفظ قاف یوں اک لفظ نہیں تھا ا سے اک لفظ ہے وہ ہے وہ کتنا کچھ تھا جانتے ہوں دوست یہ لفظ قاف یوں واقعہ ہی نا تھا ایک خوشبوؤں تھا پورا ہماری محبت کا یہ اک ایسا لفظ تھا ج سے ہے وہ ہے وہ سانسیں تھیں جو اکیلا سارے ٹھنڈے لفظوں کے بیچ گرم تھا زندہ لفظ تھا اک وہی تو گواہ تھا ہم محبت ہے وہ ہے وہ کتنے سچے تھے ایک ایسا لفظ جسے بولتے ہوئے اپنا بدن سرسرا کی قباء لگتی پیڑ ناچتے لگتے اور ہوا بہکتی لگتی یہ لفظ قاف یوں اک لفظ نہیں تھا ا سے اک لفظ ہے
Navneet Vatsal Sahil
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دھیما زہر درجے زندگی جینے کو اہم تو ہیں م گر یہ دھیما زہر ہوتی ہیں گر ہوں جائیں زیادہ تو ختم کر دیتی ہیں دھیرے دھیرے خوشیوں کو پالنے والے انسان کو آخرش ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے بھی مری جاناں جاناں سے رکھی تھیں امیدیں جاناں سے پالی تھیں خواہشیں اول روتی روتی کی امیدیں اول روتی روتی کی خواہشیں اور اب یہ حال ہے جاناں خوشیوں کی راکھ پر زندگی نفعے دھیمی موت مر رہی ہے جاناں جاناں نے مجھ کو سکھلایا ہے درجے زہر ہوتی ہیں
Navneet Vatsal Sahil
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رونا ضبط ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ پوچھتا ہوں خدا سے حقیقت خدا جو سبکا ہے میرا نہیں یہ ا پیش بات ہے جاناں جاناں بھی خدا ہی تھیں مجھے ا سے لیے شاید اب میرا کوئی بھی تو خدا نہیں پھروں بھی پوچھتا ہوں کیا یہ لوگ کبھی نہیں روئیں گے کسی روز ان کے چشمے تر نہیں ہوں گے ہے وہ ہے وہ ہے وہ پوچھوں گا ا سے روز جب ان کا اپنا ان سے چھن جائےگا روتے کیوں ہوں رونا ضبط ہے
Navneet Vatsal Sahil
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