nazmKuch Alfaaz

ग़लत-फ़हमी भले दिनों की बात है भला सा एक शहर था ग़मों के उस दयार में फ़लक से उतरी अप्सरा थी शक्ल से बहार वो गुलाब जैसे गाल थे थी चाल उस की नदियों सी कि रेशमी से बाल थे अदब था उस में इस-क़दर कि शर्म भी हया करे वो आए सज के सामने तो चाँद भी गिला करे वो जिस दिशा भी चल पड़े हज़ार भॅंवरे हम-सफ़र कि हर रक़ीब लड़ पड़े वो देख ले पलट के गर ग़मों के उस दयार से ग़मों ने फिर विदा लिया कि दिल-कशी सी छा गई यूँँ इश्क़ ने असर किया ये उन दिनों की बात है मैं बे-ख़बर था इश्क़ से वो दोस्तों की दास्ताँ मज़ाक़ थी मेरे लिए मगर मेरे नसीब में थीं बद-दुआएँ इश्क़ की सो एक रोज़ यूँँ हुआ कि रू-ब-रू वो मिल गई भली सी इक वो शाम थी गुज़र रहा था मोड़ से न जाने क्या सितम हुआ कि आ गई वो सामने नज़र से यूँँ नज़र लड़ी कि वक़्त जैसे खो गया मैं क्या बताऊँ हाल-ए-दिल कि इल्म-ए-इश्क़ हो गया गली में उस की रात-दिन यही बस एक काम था कि उस के आशिक़ों में फिर मेरा भी एक नाम था पलट के उस को देखूँ मैं तो खुल के मुस्कुराए वो मैं भाने लग गया उसे मुझे भी रास आए वो ख़ुदा ने यूँँ ग़ज़ब किया कि बात होने लग गई मैं शे'र कहने लग गया वो ख़्वाब बोने लग गई मगर हुआ ये इल्म फिर कि हम थे इख़्तिलाफ़ में मैं इश्क़ के ख़ुमार में वो इश्क़ के ख़िलाफ़ में थी उस को चश्म-ए-दोस्ती मैं इश्क़ का नशा लिए तो कोशिशें शुरू हुईं कि रिश्ता ये बचा रहे मगर है सच ये बात भी कि कब तलक फ़िज़ूल में यूँँ इश्क़ के दरख़्त पे ये दोस्ती के गुल खिलें सो एक रोज़ क्या हुआ कि बात इस-क़दर हुई मैं इश्क़ पे अड़ा रहा कि दोस्ती बिखर गई मैं इश्क़ का दलाल था वो दोस्ती को रब कहे हर इक मेरी दलील को वो जिस्म की तलब कहे ये इश्क़-विश्क़ जाल है कि मुझ को इनसे बख़्श दो अगर क़ुबूल हो तुम्हें तो दोस्ती के ख़त लिखो है इश्क़ की तलब तुम्हें मैं हूँ अलग मिज़ाज की न शौक़ कुछ तबाही का मैं लड़की काम-काज की मैं दोस्ती निभाऊँगी ख़ुदा की है क़सम मुझे मगर जो ज़िद हो इश्क़ की तो भूल जाओ तुम मुझे न उस के दिल में इश्क़ था न मेरे दिल में दोस्ती मैं मोड़ पर खड़ा रहा वो छोड़ कर चली गई थी आँख नम अगर मेरी उसे भी कुछ मलाल था मिलेंगे फिर कभी न हम ये उस को भी ख़याल था सो यूँँ हुआ कि फिर हमें नसीब ने जुदा किया वो दोस्त के बिना रही मैं इश्क़ के बिना जिया वो क्या ख़बर कहाँ गई कि कुछ पता नहीं चला मैं उस की याद में मगर हज़ार शब जगा रहा मैं अपने ग़म की दास्ताँ सुनाता ही चला गया सुख़न थे जो फ़िराक़ के वो गाता ही चला गया ये आजकल की बात है हज़ार ग़म हैं सहने को क़लम अगर उठाऊँ तो न कुछ बचा है कहने को न क़ाफ़िए बचे हैं कुछ न कुछ रदीफ़ें रह गईं थीं ग़ज़लें जो भी पास में वो आँसुओं में बह गईं है बहर की समझ कहाँ जो नज़्म कोई कह सकूँ है शा'इरी कि बेबसी मैं क्या कहूँ मैं क्या लिखूँ सो अब कुछ ऐसा हाल है कि कोई चारा-गर नहीं भला हूँ या बुरा हूँ मैं किसी को कुछ ख़बर नहीं न अब किसी से इश्क़ है न है किसी से दोस्ती है उस की शक्ल ज़ेहन में पता नहीं कभी-कभी

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مرشد مرشد پلیز آج مجھے سمے دیجئے مرشد ہے وہ ہے وہ آج آپ کو دکھڑے سناؤںگا مرشد ہمارے ساتھ بڑا ظلم ہوں گیا تو مرشد ہمارے دیش ہے وہ ہے وہ اک جنگ چھڑ گئی مرشد سبھی غنیم شرافت سے مر گئے مرشد ہمارے ذہن گرفتار ہوں گئے مرشد ہماری سوچ بھی بازاری ہوں گئی مرشد ہماری فوج کیا لڑتی حریف سے مرشد اسے تو ہم سے ہی فرصت نہیں ملی مرشد بے حد سے مار کے ہم خود بھی مر گئے مرشد ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ جرح نہیں تلوار دی گئی مرشد ہماری ذات پہ بہتان چڑھ گئے مرشد ہماری ذات پلاندوں ہے وہ ہے وہ دب گئی مرشد ہمارے واسطے ب سے ایک بے وجہ تھا مرشد حقیقت ایک بے وجہ بھی تقدیر لے اڑی مرشد خدا کی ذات پہ اندھا یقین تھا افسو سے اب یقین بھی اندھا نہیں رہا مرشد محبتوں کے نتائج ک ہاں گئے مرشد مری تو زندگی برباد ہوں گئی مرشد ہمارے گاؤں کے بچوں نے بھی کہا مرشد کوں آخہ آ کے صدا حال دیکھ وجہ مرشد ہمارا کوئی نہیں ایک آپ ہیں یہ ہے وہ ہے وہ بھی جانتا ہوں کے اچھا نہیں ہوا مرشد ہے وہ ہے وہ جل رہا ہوں ہوائیں لگ دیجئے مرشد ازالہ کیجیے دعائیں لگ دیجئے مرشد خاموش رہ

Afkar Alvi

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مری زخم نہیں بھرتے یاروں مری ناخون بڑھتے جاتے ہیں ہے وہ ہے وہ ہے وہ تنہا پیڑ ہوں جنگل کا مری پتے جھڑتے جاتے ہیں ہے وہ ہے وہ ہے وہ کون ہوں کیا ہوں کب کی ہوں ایک تیری کب ہوں سب کی ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ کوئل ہوں شہراو کی مجھے تاب نہیں ہے چھاؤں کی ایک دلدل ہے تری وعدوں کی مری پیر اکھڑتے جاتے ہیں مری زخم نہیں بھرتے یاروں مری ناخون بڑھتے جاتے ہیں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ک سے بچے کی گڑیا تھی ہے وہ ہے وہ ہے وہ ک سے پنجرے کی چڑیا تھی مری کھیلنے والے ک ہاں گئے مجھے چومنے والے ک ہاں گئے مری بالیاں گروی مت رکھنا مری کنگن توڑ نا دینا ہے وہ ہے وہ ہے وہ بنجر ہوتی جاتی ہوں کہی دریا موڑ نا دینا کبھی ملنا ا سے پر سوچیںگے ہم کیا منزل پر پہنچیں گے راستوں ہے وہ ہے وہ ہی لڑتے جاتے ہیں مری زخم نہیں بھرتے یاروں مری ناخون بڑھتے جاتے ہیں

Tehzeeb Hafi

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کیوں ہے جاناں نہیں ہوں ی ہاں پر پھروں بھی تمہارے ہونے کا احسا سے کیوں ہے کچھ ہے نہیں مری ہاتھ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں بھی کچھ ہونے کی یہ آ سے کیوں ہے بڑی حیرانی ہے مجھے کی حقیقت دور ہوکر بھی اتنا پا سے کیوں ہے سب نے کہا کہ حقیقت تو پرایا ہے حقیقت پرایا ہوکر بھی اتنا خاص کیوں ہے جتنا حقیقت دور ہے مجھ سے حقیقت اتنا ہی مجھ کو را سے کیوں ہے بیٹھا ہوں بلکل اکانت ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں بھی کانوں ہے وہ ہے وہ ا سے کی آواز کیوں ہے کھل کے نہیں کہتی حقیقت کچھ بھی ا سے کی آنکھوں ہے وہ ہے وہ اتنے راز کیوں ہیں بسی ہے دل ہے وہ ہے وہ حقیقت مری یہ میرا دل ا سے کا سمپتی کیوں ہے اس کا کا کو نہیں بھلا سکتا ہے وہ ہے وہ ہے وہ یہ ا سے کے نام کی ہر شوا سے کیوں ہے پوری کائنات ا سے کی یاد دلاتی ہے یہ تن من ہے وہ ہے وہ ا سے کا وا سے کیوں ہے حقیقت مری ہوئی نہیں ہے ابھی اس کا کا کو کھونے کے ڈر سے من اتنا بدحوا سے کیوں ہے دوریاں لکھی ہیں چنو درمیان میرا نصیب مجھ سے اتنا ناراض کیوں ہے ایسے شبد ک ہاں سے لاؤں کی حقیقت سمجھے

Divya 'Kumar Sahab'

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"ख़ूबसूरत अजनबी" मिला है सफ़र में मुझे एक चेहरा बहुत ख़ूबसूरत बहुत ख़ूबसूरत ख़ुदा ने बनाया है जो उसका मुखड़ा बहुत ख़ूबसूरत बहुत ख़ूबसूरत मुसलसल उसी को फ़क़त तक रहा हूँ उसी पर मैं इक नज़्म भी कह रहा हूँ वो रक्खी है जो अपने सर पर दुपट्टा बहुत ख़ूबसूरत बहुत ख़ूबसूरत बहुत क़ातिलाना है उसकी निगाहें बहुत जानलेवा है उसकी अदाएँ लगाई है जो उसने आँखों पे चश्मा बहुत ख़ूबसूरत बहुत ख़ूबसूरत उसे हूर कह के पुकारा है मैंने ज़रा गुफ़्तुगू करके देखा है मैंने उसे बात करने का जो है तरीक़ा बहुत ख़ूबसूरत बहुत ख़ूबसूरत है मालूम 'दानिश' वो इक अजनबी है मगर उसमें हरगिज़ न कोई कमी है जो गुज़रा है उसका मेरे साथ लम्हा बहुत ख़ूबसूरत बहुत ख़ूबसूरत

Danish Balliavi

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ

Rehaan

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ب سے پھروں سے سڑک پر دوڑ چلی ہے ب سے پھروں سے سڑک پر دوڑ چلی ہے پھروں تری شہر کو آ رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ کم ہوں رہی ہر ایک میل کی دوری پہ اپنے دل کی دھڑکنیں بڑھا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ دن گزرا ہے آج پھروں ویسا ہی تھکان بھرا پر خود کو ابھی بے حد املان پا رہا ہن ہے وہ ہے وہ ہے وہ چھایا ہے آکاش ہے وہ ہے وہ اندھیرا شوالہ اماوَ سے کا خیالوں ہے وہ ہے وہ تری روپ سا چاند بسا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ مانکر ساکشی پیچھے چھوٹتے ہر ایک گاؤں کو اتیت کی سبھی رنجشوں سے کسک مٹا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ رات کچھ کٹ چکی ہے کچھ ڈھلنی اب بھی باقی ہے سویرہ جلد ہونے کی امید لگا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ب سے پھروں سے سڑک پر دوڑ چلی ہے پھروں تری شہر کو آ رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ب سے پھروں سے سڑک پر دوڑ چلی ہے پھروں تری شہر سے خالی ہاتھ جا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ بڑھ رہی ہر ایک میل کی دوری پہ تری کیے حقیقت سبھی وعدے بھلا رہا ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ رات تری خوابوں سے نیند مکمل شاداب ہوئی جانے پھروں کیوں خود کو اتنا کلانت پا رہا ہوں ہے

Rehaan

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ایسا کیوں ہوتا ہے ایسا کیوں ہوتا ہے جاتا ہے کوئی تو لوٹ کے پھروں لگ حقیقت آتا دوبارہ ایسا کیوں ہوتا ہے چندا کے جانے سے لگتا فلک یہ سونا سارا دنیا یہ پیار کی دشمن ا سے سے لگ پار پاتا ہے دل ایسا کیوں ہوتا ہے مولا اپنوں سے ہار جاتا ہے دل ایسا کیوں ہوتا ہے دل جو بچھڑتے ہیں دن لگ گزرنے ہیں شا ہے وہ ہے وہ ہے وہ لگ کٹتی ہیں راتیں لگ چھٹتی ہیں لگتا نہیں کہی دل یہ بیچارا ایسا کیوں ہوتا ہے رہتی ہیں آنکھیں نمہ ہوں نہیں پاتا ہے گزارا وعدے کیے تھے ا سے نے جو وعدے تھے ا سے کے سارے جھوٹے جتنا اسے تھا کل چاہا خود سے ہیں آج اتنے روٹھے ایسا کیوں ہوتا ہے بھول لگ چا ہوں تو دل کو مناؤں تو دل لگ سمجھتا ہے مجھ سے الجھتا ہے کرتا ہے ا سے پہ ہی ب سے یہ اشارہ ایسا کیوں ہوتا ہے جب بھی یوں ہوتا ہے دل یہ ہوں جاتا ترساؤ

Rehaan

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پھروں ایک رات یوں ہی گزر جانے کو ہے پھروں ایک رات یوں ہی گزر جانے کو ہے خواب سارے ٹوٹ کر کہی صفر جانے کو ہیں گھونسلہ وہم و گمان کا پھروں سے اجڑ جانے کو ہے زخم حقیقت پرانی پھروں نکھر آنے کو ہیں سارا ج ہاں مانو گہری نیند ہے وہ ہے وہ سو گیا تو ہے یہ من میرا پھروں ان حسین یادوں ہے وہ ہے وہ کھو گیا تو ہے چنو پھروں کوئی نجم لکھنے کی ضد پہ اڑی ہے غنیم دل کی یہ عادت آج بھی بے حد بری ہے آنکھوں سے نیند پھروں گم سی گئی ہے سینے ہے وہ ہے وہ دھڑکن چنو تھم سی گئی ہے یہ چنچل ہوائیں یہ گم سوم گھٹائیں مجھے خود سے کہی دور لے جا رہی ہیں حقیقت سنسان سڑکیں حقیقت ویران گلیاں مجھے پھروں سے اپنے پا سے بلا رہی ہیں ہرایک پروانے کو چنو ب سے شمع کی تلاش ہے لہروں کے من ہے وہ ہے وہ بھی کوئی ادھوری سی پیا سے ہے ستارے تم تم اب چمک چمک کر تھک سے گئے ہیں پتے بھی پوری طرح شبنم سے لپٹ گئے ہیں سمے چنو ریت کی طرح فسل رہا ہے چاند تیزی سے فلک کی اور بڑھ رہا ہے یہ سکون اندھیرا پھروں سے اتر جانے کو ہے یہ خوبصورت نظارے پھروں سے بکھر جانے کو ہیں پھروں ایک ر

Rehaan

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بن تری مجھے جینا ہے بن تری یہ سچ اپنا نہیں سکتا بچھڑ کر تجھ سے واپ سے خود کو بھی اب پا نہیں سکتا محبت ایک ایسا غم ہے جو سب کو رلاتا ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ کتنا رویا تڑپا ہوں تجھے سمجھا نہیں سکتا تیری ہر یاد کانٹوں کی طرح دل کو دکھاتی ہے ہے وہ ہے وہ ہے وہ کتنے درد ہے وہ ہے وہ ہوں یہ تجھے بتلا نہیں سکتا تیرا چہرہ مری آنکھوں ہے وہ ہے وہ اب ہر پل جھلکتا ہے تری خوابوں ہے وہ ہے وہ ہی جاناں میرا ہر دن گزرتا ہے بھلے تجھ سے لگ کہ پایا ہے وہ ہے وہ اپنے دل کی باتیں پر ہے وہ ہے وہ ہے وہ کتنا چاہتا ہوں تجھ کو میرا دل سمجھتا ہے خدا سے اب یہ خواہش ہے کہ تو ب سے مری ہوں جائے تری بن جینا ناممکن یہ دل تجھ پہ ہی مرتا ہے

Rehaan

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