nazmKuch Alfaaz

جب پاپا پاپا کہتے تھے جب پاپا پاپا کہتے تھے ہم کتنے مزے ہے وہ ہے وہ رہتے تھے جب پاپا ہم نے کہوائی جاں پھٹ کے گلے ہے وہ ہے وہ ہے آئی تب ہنستے گاتے پھرتے تھے اب مارے مارے پھرتے ہیں لگ ہی کچھ کھونے کا ڈر تھا تب لگ ہی کچھ پانے کی اچھا تھی تب من ہے وہ ہے وہ ج ہاں بھی آتا تھا وہیں پہ رویا کرتے تھے ہم رونے کے لیے بھی اب ہم کو جا بک کروانی پڑتی ہے جب پاپا پاپا کہتے تھے ہم کتنے مزے ہے وہ ہے وہ رہتے تھے سکول کو ہم جاناں جاتے تھے تب زیب ہے وہ ہے وہ پیسے رہتے تھے اب ہاتھ سبھی کے خالی ہیں کیسی یار اب کی پڑھائی ہے حقیقت پیٹھ پہ بوجھ کتابوں کا اور جیب ہے وہ ہے وہ کنچے رہتے تھے جب سکول سے گھر آتے تھے تو چاک چرا کر لاتے تھے گلی ڈنڈا لے لے کر روز ہم گلیوں گلیوں پھرتے تھے جب پاپا پاپا کہتے تھے ہم کتنے مزے ہے وہ ہے وہ رہتے تھے یاد آتا ہے حقیقت دور ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ دا گرا کے آنچل ہے وہ ہے وہ سیاہ بخت تھے ممی کو جھوٹ بتاتے تھے پاپا کو جھوٹ بتاتے تھے پھروں ہوتی خوب پٹائی تھی ہم اکڑ بکر کرتے تھ

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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ایک سال و مری دل کے ٹکڑے مری بہنا مری بیٹی مری بچے آج ایک سال ہوں گیا تو تمہیں باشندہ اے عدم آباد ہوئے مری چھوٹی سی دنیا کو برباد ہوئے چنو یہ خوشبو دھوپ ابر و باد ہوئے تمہیں آزاد ہوئے مجھے شب زاد ہوئے جاناں سے کوئی ویواد ہوئے مجھے نامراد ہوئے ا سے دل کو نا شاد ہوئے تمہیں قاف یوں ایک یاد ہوئے مری بیٹی آج ایک سال ہوں گیا تو مقدر کو بگڑے ہوئے مجھے جاناں سے بچھڑے ہوئے ا سے گھر کو اجڑے ہوئے ا سے دل کے ٹکڑے ہوئے بیٹھا رہتا ہوں ہے وہ ہے وہ تیری تصویر کو پکڑے ہوئے بیٹھی ہے تیری یاد دل ہے وہ ہے وہ دل کو جکڑے ہوئے تری مری جھگڑے ہوئے اور مجھے تجھ پہ اکڑے ہوئے ابھاگے باپ کے مکھڑے سے ایک آنکھ کو لکڑے ہوئے ابھاگے بھائی کے کندھے سے ایک بازو کو اکھڑے ہوئے مری بیٹی آج ایک سال ہوں گیا تو خوشیوں کو گھر چھوڑے ہوئے خدا کو مقدر پھوڑے ہوئے گھر کی طرف سیلاب کو موڑے ہوئے مری نیند کو چینے خواب کو گرفت ہوئے ڈاکٹر کے پیرو ہے وہ ہے وہ لوٹے ہوئے ہاتھوں کو جوڑے ہوئے تجھ کو یہ دنیا چھوڑے ہوئے مجھے دنیا سے سب کم ع

Chhayank Tyagi

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ہے وہ ہے وہ اور جاناں ہم دونوں مستقبل ہے وہ ہے وہ ایک ہونا چاہتے تھے ہے وہ ہے وہ ہے وہ ا سے خیال سے ڈرتی تھی اور حقیقت دعا مانگتے تھے حقیقت مجھے ہر گھڑی اور موڑ پہ سنبھالتا تھا مگر دونوں ڈرتے تھے کیونکہ دونوں الگ مذہب سے تھے عشق ہے وہ ہے وہ اتنی آزمایا ہے کیوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ اسی سوچ ہے وہ ہے وہ رویا کرتی تھی آنکھ سے آنسو بہتے تھے تکیے کو بھگویا کرتی تھی اور حقیقت بھی اسی سوچ ہے وہ ہے وہ پریشان تھا ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہندو تھی اور حقیقت مسلمان تھا ساتھ ہوکر کبھی الگ ہوں گے یار پھروں ساتھ ہے وہ ہے وہ غلط ہوں گے ڈانٹتی تھی اسے برابر دن اور حقیقت چپ مجھے عجب ہوں گے ا سے کے گھر والے مان جاتے لیکن میرا گھر مجھے مار دیتا ہے وہ ہے وہ ہے وہ اگر ا سے کی نہیں ہوتی ایک دن حقیقت خود کو ہار دیتا ا سے لیے ہم دونوں ایک اچھی نوکری چاہتے تھے نوکری ہوں گی تو سب مان آئی جائیں گے یہ ہم مانتے تھے لیکن ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پتا نہیں تھا ہمارے ساتھ آگے کیا ہوگا یا پھروں ہم ا سے کے رہیں گے بھی یا حقیقت مجھ سے جدا ہوگا<b

Arohi Tripathi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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ہجر نہ جانے کیسے لوگ تھے حقیقت جو ان کے دل کو بھا گئے ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے محبت چاہی تو حقیقت یادیں مجھ کو تھما گئے پریم جتنا دل ہے وہ ہے وہ تھا زبان ہوتے ہوتے پر آ کر لفظ ہوا جب جاناں نے ان کو سنا نہیں نمہ بنکر نہین ہے وہ ہے وہ سما گئے دل ہے وہ ہے وہ تھی ایک آ سے بچی تیری بے رکھ سے ہار گئی حقیقت محبت تھی میری جو جاناں ہنسی ہے وہ ہے وہ قسمیں گئے جاناں نے آنکھیں جو پھیری ہیں اب ایسا شام سویرہ ہے سورج ہے چنو بجھا ہوا جام عنایت جاناں چنو جلا گئے کانوں کو تھے جو تیر لگے حقیقت دل پر آ کر زخم ہوئے اب درد آنکھوں ہے وہ ہے وہ رہتا ہے یہ کیا جاناں مجھ کو سنا گئے ساگر جو بادل بنکر ساحل سے تھا جدا ہوا پہاڑ نے پوچھا حال ذرا سارا منظر حقیقت بہا گئے نیند ہٹا کر آنکھوں سے یہ خواب تمہارے بیٹھے ہیں یاد اٹھی جب آنکھوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ تو خواب یہ سارے نہا گئے بس پیدل ہی چل کر کے کوئی بھوساگر پار ہوا اور ای سے زمیں پر ڈوب کر یہ جان کتنے گنوا گئے اب بس اکیلا رہتا ہے<b

Divya 'Kumar Sahab'

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م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے تو سب سے جدا ہے تو سب سے حسین ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے زمانے ہے وہ ہے وہ تجھسا لگ کوئی کہی ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے تجھے دیکھ کر ہی نکلتا ہے سورج تجھے دیکھ کر روز ڈھلتا ہے سورج تو اک باوضو اپسرا ہے مری جاں خدا بھی تو تجھ پہ فدا ہے مری جاں تجھی سے محبت کرےگا یقین ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے تجھے کام سب چھوڑ کر دیکھتے ہیں بنا بات کے پھول بھی پھینکتے ہیں کہ ممتاز بھی تری جیسی نہیں ہے ی ہاں ایک تو ہی مہا سندری ہے بے حد خوبصورت ہے زہرہ جبیں ہے م گر تجھ کو ا سے کی خبر ہی نہیں ہے

Prashant Kumar

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"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी

Prashant Kumar

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"ज़मीं-ए-हिंद" सारे जहाँ से अच्छी बस हिंद की ज़मीं है आबाद करने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस के ही लब पे पहले वहदत का गीत आया इसने ही सब सेे पहले पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया सारे जहाँ को इसने इल्म-ओ-हुनर सिखाया कोई भी गीत क़ौमी इसने न गुनगुनाया नंगे उघारे फिरते लोगों की आबरू को मिंदील देने वाली हर एक को ज़मीं है दुश्नाम दे रहा है हर शख़्स इस ज़मीं को तिरपाल जब दिया है इसने ही हर किसी को सारे जहाँ को इसने जीवन नया दिया है सहराओं तक में इसने हर गुल खिला दिया है निखरे हैं इस ज़मीं में रुख़सार हम-नशीं के गजरे में खिलने वाला गुलफ़ाम भी ज़मीं है हिंदू का है न इस पर मुर्ग-ए-हरम का एहसाँ अंधा हुआ पड़ा है क्यूँँ धर्म में फिर इंसाँ शामिल है ख़ून इस में हम सबके तन बदन का सदक़ा उठा रहे हैं सब इस के बाँकपन का सारा जहाँ पला है आँचल में इस ज़मीं के ताक़ों पे धरने वाली हर क़ौम को ज़मीं है ज़िंदा है इस के दम पर सारे जहाँ की रौनक़ सब आज़मा रहे हैं इस के ही दम पे क़िस्मत इसने नहीं सिखाया आपस में बैर करना इसने सिखाया सब को आपस में प्रेम करना हिंदू हों या हों मुस्लिम वंदे हैं सब इसी के आँचल में लेने वाली इक साथ सब ज़मीं है है इस ज़मीं पे सबका हक़ एक ही बराबर कोई नहीं है नीचे कोई नहीं है ऊपर दुख सुख में इस के हरदम सब लोग साथ होंगे मुस्लिम हों सिख हों हिंदू सब साथ साथ होंगे आएगी आँच इस पर हाथों में हाथ होंगे सब छाँव में इसी की पलकर बड़े हुए हैं दाना खिलाने वाली हर शख़्स को ज़मीं है इस पर जब आँच आए सब साथ चल के आना धर्मों को मज़-हबों को रस्ते में छोड़ आना क़ौमी लिबास सारे घूरे पे फेंक आना हाथों में हाथ डाले सब मुस्कुराते आना तुम मुश्किलों में इस को मत छोड़ कर के जाना तरसे हैं इस ज़मीं को मत पूछो कितने काफ़िर इक़बाल से मिली पर तुम को ही ये ज़मीं है इस हिंद की ज़मीं पर जो भी उठाए उँगली उस को अभी उठा ले ख़ालिक़ तू इस जहाँ से इस हिंद की ज़मीं पर जिस का जनम हुआ है आबाद रखना ख़ालिक़ मेरी यही दुआ है

Prashant Kumar

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"दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है" अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है होंठों पे मिरे प्यार का पैग़ाम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है ये रोग जवानी में सभी को ही लगा है बिन इश्क़ मोहब्बत के भला किस का हुआ है ऐसा है यहाँ कौन जो बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मतलब की मोहब्बत से परेशान रहा हूँ मैं क्यूँँकि यहाँ बनके इक इंसान रहा हूँ कैसा भी कहीं दिल को अब आराम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है लोगों ने मोहब्बत का यहाँ ढोंग रचाया वादे सभी झूटे किए इल्ज़ाम लगाया मुझ सा कोई आशिक़ कहीं बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मैं जाऊँ जिधर लोग हँसी मेरी उड़ाते पागल भी बताते हैं मुझे फिर भी सताते मालिक तिरी दुनिया में मिरा काम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है

Prashant Kumar

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سب ڈگریوں کے پیچھے پڑے ہیں ہے وہ ہے وہ ہے وہ جدھر بھی نظر ڈالتا ہوں لوگ رستے سے بھٹکے ہوئے ہیں آجکل سب ہنر چھوڑ کر ان ڈگریوں کے ہی پیچھے پڑے ہیں ڈگریوں ہے وہ ہے وہ ہنر کوئی ہوتا تو پھروں اتہا سے انپڑھ لگ لکھتے ڈگریوں کے یہ پیرویا سڑک پر یوں سر عام سستے لگ بکتے یہ پتا چلتا ہے ڈگریوں سے ہم ک ہاں تک معیار ہیں لکھے ہیں جانتے ہیں م گر لوگ پھروں بھی ڈگریوں کے ہی پیچھے پڑے ہیں ڈگریوں کے جو پیچھے پڑے ہیں حقیقت زمانے ہے وہ ہے وہ نوکر بنیں گے کام خود کے ہنر پر کریںگے حقیقت زمانے کے مالک بنیں گے ڈگریوں سے تو مشعل جاں ہیں نوکر پر ہنر ہم کو مالک بناتا ڈگریوں والے ہوں یا ہوں انپڑھ سب کو قدموں ہے وہ ہے وہ لا کر جھکاتا عمر برباد ہے ڈگریوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ دوست تقدیر کو دے رہے ہیں کیا کریں لوگ نادان بڑے ہیں ڈگریوں کے ہی پیچھے پڑے ہیں پیچھے بھاگو لگ جاناں ڈگریوں کے پیچھے بھاگو سب اپنے ہنر کے دیکھنا جان لوگے ہنر تو رکھ ہی دوگے زما لگ بدل کے ورنا مارے ہجرت فروغ جاناں کو رکھ دےگی دنیا بدل کے ڈگریوں ہے وہ ہے وہ

Prashant Kumar

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