मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
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ا سے سے محبت جھیلیں کیا ہیں ا سے کی آنکھیں عمدہ کیا ہے ا سے کا چہرہ خوشبو کیا ہے ا سے کی سانسیں خوشیاں کیا ہیں ا سے کا ہونا تو غم کیا ہے ا سے سے جدائی ساون کیا ہے ا سے کا رونا سر گرا کیا ہے ا سے کی اداسی گرمی کیا ہے ا سے کا غصہ اور بہاریں ا سے کا ہنسنا میٹھا کیا ہے ا سے کی باتیں کڑوا کیا ہے مری باتیں کیا پڑھنا ہے ا سے کا لکھا کیا سننا ہے ا سے کی غزلیں لب کی خواہش ا سے کا ماتھا زخم کی خواہش ا سے کا چھونا دنیا کیا ہے اک جنگل ہے اور جاناں کیا ہوں پیڑ سمجھ لو اور حقیقت کیا ہے اک راہی ہے کیا سوچا ہے ا سے سے محبت کیا کرتے ہوں ا سے سے محبت زار پیشہ ا سے سے محبت ا سے کے علاوہ ا سے سے محبت ا سے سے محبت
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا
Jaun Elia
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یاد ہے پہلے روز کہا تھا یاد ہے پہلے روز کہا تھا پھروں نہ کہنا غلطی دل کی پیار سمجھ کے کرنا لڑکی پیار نبھانا ہوتا ہے پھروں پار لگانا ہوتا ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا ساتھ چلو تو پورے سفر تک مر جانے کی اگلی خبر تک سمجھو یار خدا تک ہوگا سارا پیار وفا تک ہوگا پھروں یہ بندھن توڑ نہ جانا چھوڑ گئے تو پھروں نہ آنا چھوڑ دیا جو تیرا نہیں ہے چلا گیا جو میرا نہیں ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا یا تو ٹوٹ کے پیار نہ کرنا یا پھروں پیٹھ پہ وار نہ کرنا جب نادانی ہو جاتی ہے نئی کہانی ہو جاتی ہے نئی کہانی لکھ لاوں گا اگلے روز میں بک جاؤں گا تیرے گل جب کھیل جائیں گے مجھ کو پیسے مل جائیں گے یاد ہے پہلے روز کہا تھا بچھڑ گئے تو موج اڑانا واپس میرے پاس نہ آنا جب کوئی جا کر واپس آئے روئے تڑپے یا پچھتائے میں پھروں اس کو ملتا نہیں ہوں ساتھ دوبارہ چلتا نہیں ہوں گم جاتا ہوں کھو جاتا ہوں میں پتھر کا ہو جاتا ہوں
Khalil Ur Rehman Qamar
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ساتھ یوں ہے وہ ہے وہ نے برسوں تمہارے لیے چاند تاروں بہاروں کے سپنے بنے حسن اور عشق کے گیت گاتا رہا آرزوؤں کے ایواں سجاتا رہا ہے وہ ہے وہ ہے وہ تمہارا مغنی تمہارے لیے جب بھی آیا نئے گیت لاتا رہا آج لیکن مری دامن چاک ہے وہ ہے وہ ہے وہ گرد راہ سفر کے سوا کچھ نہیں مری بربط کے سینے ہے وہ ہے وہ ن غموں کا دم گھٹ گیا تو تانیں چیخوں کے امبار ہے وہ ہے وہ دب گئی ہیں اور گیتوں کے سر ہچکیاں بن گئے ہیں ہے وہ ہے وہ ہے وہ تمہارا مغنی ہوں نغمہ نہیں ہوں اور نغمے کی تخلیق کا ساز و ساماں ساتھ یوں آج جاناں نے بھسم کر دیا ہے اور ہے وہ ہے وہ اپنا ٹوٹا ہوا ساز تھامے سرد لاشوں کے امبار کو تک رہا ہوں مری چاروں طرف موت کی وحشتیں من اندھیرا ہیں اور انساں کی حیوانیت جاگ اٹھی ہے بربریت کے خوں خوار افریت اپنے ناپاک جبڑوں کو کھولے خون پی پی کے غررا رہے ہیں بچے ماوں کی گودوں ہے وہ ہے وہ سے ہمیں ہوئے ہیں عصمتیں سر برہ لگ پریشان ہیں ہر طرف شور آہ و بکا ہے اور ہے وہ ہے وہ ا سے تباہی کے طوفان ہے وہ ہے وہ ہے وہ آگ اور خوں کے ہیجان ہے وہ ہے وہ ہے وہ<
Sahir Ludhianvi
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"वो सुब्ह कभी तो आएगी" 1 वो सुब्ह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्में गाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैं जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे सीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी वो सुब्ह कभी तो आएगी 2 वो सुब्ह हमीं से आएगी जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे उस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे दुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगी वो सुब्ह हमीं से आएगी
Sahir Ludhianvi
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یہ کوچے یہ نیلامگھر دلکشی کے یہ لٹتے ہوئے کارواں زندگی کے کہاں ہیں کہاں ہے محافظ خودی کے جنہیں ناز ہے ہند پر حقیقت کہاں ہیں یہ پرپیچ گلیاں یہ بدنام بازار یہ گمنام راہی یہ بکھرنے کی جھنگار یہ عصمت کے سودے یہ سودوں پہ تکرار جنہیں ناز ہے ہند پر حقیقت کہاں ہیں یہ صدیوں سے بےخواب سہمی سی گلیاں یہ مسلی ہوئی ادھکلی زرد مصروف یہ بکتی ہوئی کھوکھلی رنگ رلیاں جنہیں ناز ہے ہند پر حقیقت کہاں ہیں حقیقت اجلے دریچوں ہے وہ ہے وہ پائل کی چھن چھن تھکی ہاری سانسوں پہ طبلے کی دھن دھن یہ بےروح کمروں ہے وہ ہے وہ کھانسی کی ٹھن ٹھن جنہیں ناز ہے ہند پر حقیقت کہاں ہیں یہ پھولوں کے گجرے یہ پیکوں کے چھینٹے یہ بےباک نظریں یہ گستاخ فکرے یہ ڈھلکے بدن اور یہ بیمار چہرے جنہیں ناز ہے ہند پر حقیقت کہاں ہیں یہاں پیر بھی آ چکے ہیں جواں بھی تنومند بیٹے بھی ابا میاں بھی یہ بیوی بھی ہے اور بہن بھی ہے ماں بھی جنہیں ناز ہے ہند پر حقیقت کہاں ہیں مدد چاہتی ہے یہ حوا کی بیٹی غضب کی ہمجنس رادھا کی بیٹی پیغمبر کی امت زلیخا کی بی
Sahir Ludhianvi
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حراس تیرے ہونٹوں پہ تبسم کی وہ ہلکی سی لکیر میرے اڑو میں رہ رہ کے جھلک اٹھتی ہے یوں اچانک تری آریض گلابی کا خیال آتا ہے جیسے ظلمت میں کوئی شمع بھڑک اٹھتی ہے تیرے پیرہن رنگیں کی جنوں خیز مہک خواب بن بن کے مری ذہن میں لہراتی ہے رات کی سرد خموشی میں ہر اک جھونکے سے تیرے انفاس تری جسم کی آنچ آتی ہے میں دستور ہوئے رازوں کو عیاں تو کر دوں لیکن ان رازوں کی تشہیر سے جی ڈرتا ہے رات کے خواب اجالے میں بیاں تو کر دوں ان حسین خوابوں کی تعبیر سے جی ڈرتا ہے تیری سانسوں کی تھکن تیری نگاہوں کا سکوت درحقیقت کوئی رنگین شرارت ہی نہ ہو میں جسے پیار کا انداز سمجھ بیٹھا ہوں وہ تبسم وہ تکلم تری عادت ہی نہ ہو سوچتا ہوں کہ تجھے مل کے میں جس سوچ میں ہوں پہلے اس سوچ کا مقسوم سمجھ لوں تو کہوں میں تری شہر میں انجان ہوں پردیسی ہوں تیرے الطاف کا مفہوم سمجھ لوں تو کہوں کہیں ایسا نہ ہو پاؤں مری تھرا جائیں اور تری مرمریں بانہوں کا سہارا نہ ملے اشک بہتے رہیں خاموش سیہ راتوں میں اور تری ریشمی آنچل کا کنارہ نہ ملے
Sahir Ludhianvi
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تاج تری لیے اک مظہر الفت ہی صحیح تجھ کو ا سے وا گرا رنگیں سے عقیدت ہی صحیح مری محبوب کہی اور ملا کر مجھ سے بزم شاہی ہے وہ ہے وہ غریبوں کا گزر کیا معنی ثبت ج سے راہ ہے وہ ہے وہ ہوں سطوت شاہی کے نشان ا سے پہ الفت بھری روحوں کا سفر کیا معنی مری محبوب پ سے پردہ تشہیر وفا تو نے سطوت کے نشانوں کو تو دیکھا ہوتا مردہ شا ہوں کے مقابر سے بہلنے والی اپنے تاریک مکانوں کو تو دیکھا ہوتا ان گنت لوگوں نے دنیا ہے وہ ہے وہ محبت کی ہے کون کہتا ہے کہ صادق لگ تھے جذبے ان کے لیکن ان کے لیے تشہیر کا سامان نہیں کیونکہ حقیقت لوگ بھی اپنی ہی طرح مفل سے تھے یہ عمارت و مقابر یہ فصیلیں یہ حصار مطلق الحکم شہنشا ہوں کی عظمت کے ستون سی لگ دہر کے ناسور ہیں کہ لگ ناسور جذب ہے ان ہے وہ ہے وہ تری اور مری ٹھی سے کا خوں مری محبوب ا نہیں بھی تو محبت ہوں گی جن کی ثنائی نے بخشی ہے اسے شکل جمیل ان کے پیارو کے مقابر رہے بےنام و نمود آج تک ان پہ جلائی لگ کسی نے قندیل یہ چمن زار یہ جمنا کا کنارہ یہ محل یہ م نقش در و دی
Sahir Ludhianvi
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