dosto durd pilao ki kadi raat kate mai men kuchh aur milao ki kadi raat kate ansuon se ye kadi raat nahin kat sakti aaj mai-khana lundhao ki kadi raat kate naghhme bazar men mahnge hain to kya ghham yaaro nauhe ko naghhma banao ki kadi raat kate ziist aur maut asatir-e-kuhan hain yaaro naya afsana sunao ki kadi raat kate koi mashhud hai ab aur na koi shahid aur agar hai to dikhao ki kadi raat kate ye bhi iman hi ka dusra rukh hai logo kufr ko diin banao ki kadi raat kate ye andhera ye samundar ye talatum aao aao aur mujh men samao ki kadi raat kate dosto durd pilao ki kadi raat kate mai mein kuchh aur milao ki kadi raat kate aansuon se ye kadi raat nahin kat sakti aaj mai-khana lundhao ki kadi raat kate naghme bazar mein mahnge hain to kya gham yaro nauhe ko naghma banao ki kadi raat kate zist aur maut asatir-e-kuhan hain yaro naya afsana sunao ki kadi raat kate koi mashhud hai ab aur na koi shahid aur agar hai to dikhao ki kadi raat kate ye bhi iman hi ka dusra rukh hai logo kufr ko din banao ki kadi raat kate ye andhera ye samundar ye talatum aao aao aur mujh mein samao ki kadi raat kate
Related Ghazal
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
Jaun Elia
88 likes
जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस
Sandeep Thakur
50 likes
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है न शो'ले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा कोई बताओ कि वो शोख़-ए-तुंद-ख़ू क्या है ये रश्क है कि वो होता है हम-सुख़न तुम से वगर्ना ख़ौफ़-ए-बद-आमोज़ी-ए-अदू क्या है चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़ सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है पि यूँँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो-चार ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
Mirza Ghalib
32 likes
ख़्वाब तुम्हारे आते हैं इतराते हैं हम जब जब सो जाते हैं इतराते हैं उस पर मरने वाले जितने लड़के हैं मुझ सेे मिलने आते हैं इतराते हैं सरकारी दफ्तर में बेटा नौकर है पापा मिल कर आते हैं इतराते हैं हम तो ख़ामोशी में डूबे हैं लेकिन ज़ख़्म हमारे गाते हैं इतराते हैं मैं ऐसा गुमनाम हुआ हूँ लोग मुझे मेरा शे'र सुनाते हैं इतराते हैं
Anand Raj Singh
24 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Saghar Nizami.
Similar Moods
More moods that pair well with Saghar Nizami's ghazal.







