किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँँ नहीं होता मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िंदा क्यूँँ नहीं होता मिरी इक ज़िंदगी के कितने हिस्से-दार हैं लेकिन किसी की ज़िंदगी में मेरा हिस्सा क्यूँँ नहीं होता जहाँ में यूँँ तो होने को बहुत कुछ होता रहता है मैं जैसा सोचता हूँ कुछ भी वैसा क्यूँँ नहीं होता हमेशा तंज़ करते हैं तबीअत पूछने वाले तुम अच्छा क्यूँँ नहीं करते मैं अच्छा क्यूँँ नहीं होता ज़माने भर के लोगों को किया है मुब्तला तू ने जो तेरा हो गया तू भी उसी का क्यूँँ नहीं होता
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़ मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ मुझे जल्दी है उस के दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़ यूँँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन तुझ से जुदा होने के बा'द का पहला हफ़्ता एक तरफ़ उस की आँखों ने मुझ सेे मेरी ख़ुद्दारी छीनी वरना पाँव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ़ मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उस ने सहरा एक तरफ़ रक्खा और दरिया एक तरफ़
Tehzeeb Hafi
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किसे ख़बर है कि उम्र बस उस पे ग़ौर करने में कट रही है कि ये उदासी हमारे जिस्मों से किस ख़ुशी में लिपट रही है अजीब दुख है हम उस के होकर भी उस को छूने से डर रहे हैं अजीब दुख है हमारे हिस्से की आग औरों में बट रही है मैं उस को हर रोज़ बस यही एक झूठ सुनने को फ़ोन करता सुनो यहाँ कोई मस’अला है तुम्हारी आवाज़ कट रही है मुझ ऐसे पेड़ों के सूखने और सब्ज़ होने से क्या किसी को ये बेल शायद किसी मुसीबत में है जो मुझ से लिपट रही है ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज़्दाद बेच देगी जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है सो इस तअ'ल्लुक़ में जो ग़लत-फ़हमियाँ थीं अब दूर हो रही हैं रुकी हुई गाड़ियों के चलने का वक़्त है धुँध छट रही है
Tehzeeb Hafi
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आख़िर तो डूबना ही था काग़ज़ की नाव को इल्ज़ाम देते रहिए नदी के बहाव को दिल के धुऐं को आँखों में आने नहीं दिया आसाँ नहीं था साधना इस रख-रखाव को बन आई जाँ पे जब पड़ा सामान बाँधना मंज़िल समझ के बैठ गए थे पड़ाव को
Rajesh Reddy
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जाने कितनी उड़ान बाक़ी है इस परिंदे में जान बाक़ी है जितनी बँटनी थी बँट चुकी ये ज़मीं अब तो बस आसमान बाक़ी है अब वो दुनिया अजीब लगती है जिस में अम्न-ओ-अमान बाक़ी है इम्तिहाँ से गुज़र के क्या देखा इक नया इम्तिहान बाक़ी है सर क़लम होंगे कल यहाँ उन के जिन के मुँह में ज़बान बाक़ी है
Rajesh Reddy
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यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है
Rajesh Reddy
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