nazmKuch Alfaaz

کچھ جاناں نے کہا کچھ ہے وہ ہے وہ نے کہا اور بڑھتے بڑھتے بات بڑھی دل اوب گیا تو دل ڈوب گیا تو اور گہری کالی رات بڑھی جاناں اپنے گھر ہے وہ ہے وہ ہے وہ اپنے گھر سارے دروازے بند کیے بیٹھے ہیں کڑوے گھونٹ پیے اوڑھے ہیں نبھائیے کی چادر کچھ جاناں سوچو کچھ ہے وہ ہے وہ سوچوں کیوں اونچی ہیں یہ دیواریں کب تک ہم ان پر سر ماریں کب تک یہ اندھیرے رہنے ہیں کی لگ کے یہ گھیرے رہنے ہیں چلو اپنے دروازے کھولیں اور گھر کے باہر آئیں ہم دل ٹھہرے ج ہاں ہیں برسوں سے حقیقت اک نکڑ ہے خوبصورت کا کب تک ا سے نکڑ پر ٹھہرے اب ا سے کے آگے جائیں ہم ب سے تھوڑی دور اک دریا ہے ج ہاں ایک اجالا بہتا ہے واں لہروں لہروں ہیں کرنیں اور کرنوں کرنوں ہیں لہریں ان کرنوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ان لہروں ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہم دل کو خوب نہانے دیں سینوں ہے وہ ہے وہ جو اک پتھر ہے ا سے پتھر کو گھل جانے دیں دل کے اک کونے ہے وہ ہے وہ بھی چھپی گر تھوڑی سی بھی خوبصورت ہے ا سے خوبصورت کو دھل جانے دیں دونوں کی طرف سے ج سے دن بھی اظہار ندا

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ا سے سے محبت جھیلیں کیا ہیں ا سے کی آنکھیں عمدہ کیا ہے ا سے کا چہرہ خوشبو کیا ہے ا سے کی سانسیں خوشیاں کیا ہیں ا سے کا ہونا تو غم کیا ہے ا سے سے جدائی ساون کیا ہے ا سے کا رونا سر گرا کیا ہے ا سے کی اداسی گرمی کیا ہے ا سے کا غصہ اور بہاریں ا سے کا ہنسنا میٹھا کیا ہے ا سے کی باتیں کڑوا کیا ہے مری باتیں کیا پڑھنا ہے ا سے کا لکھا کیا سننا ہے ا سے کی غزلیں لب کی خواہش ا سے کا ماتھا زخم کی خواہش ا سے کا چھونا دنیا کیا ہے اک جنگل ہے اور جاناں کیا ہوں پیڑ سمجھ لو اور حقیقت کیا ہے اک راہی ہے کیا سوچا ہے ا سے سے محبت کیا کرتے ہوں ا سے سے محبت زار پیشہ ا سے سے محبت ا سے کے علاوہ ا سے سے محبت ا سے سے محبت

Varun Anand

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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حقیقت لوگ بے حد خوش قسمت تھے جو عشق کو کام سمجھتے تھے یا کام سے کرنے والے کرتے تھے ہم جیتے جی مصروف رہے کچھ عشق کیا کچھ کام کیا کام عشق کے آڑے آتا رہا اور عشق سے کام الجھتا رہا پھروں آخر تنگ آ کر ہم نے دونوں کو ادھورا چھوڑ دیا

Faiz Ahmad Faiz

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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یاد ہے پہلے روز کہا تھا یاد ہے پہلے روز کہا تھا پھروں نہ کہنا غلطی دل کی پیار سمجھ کے کرنا لڑکی پیار نبھانا ہوتا ہے پھروں پار لگانا ہوتا ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا ساتھ چلو تو پورے سفر تک مر جانے کی اگلی خبر تک سمجھو یار خدا تک ہوگا سارا پیار وفا تک ہوگا پھروں یہ بندھن توڑ نہ جانا چھوڑ گئے تو پھروں نہ آنا چھوڑ دیا جو تیرا نہیں ہے چلا گیا جو میرا نہیں ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا یا تو ٹوٹ کے پیار نہ کرنا یا پھروں پیٹھ پہ وار نہ کرنا جب نادانی ہو جاتی ہے نئی کہانی ہو جاتی ہے نئی کہانی لکھ لاوں گا اگلے روز میں بک جاؤں گا تیرے گل جب کھیل جائیں گے مجھ کو پیسے مل جائیں گے یاد ہے پہلے روز کہا تھا بچھڑ گئے تو موج اڑانا واپس میرے پاس نہ آنا جب کوئی جا کر واپس آئے روئے تڑپے یا پچھتائے میں پھروں اس کو ملتا نہیں ہوں ساتھ دوبارہ چلتا نہیں ہوں گم جاتا ہوں کھو جاتا ہوں میں پتھر کا ہو جاتا ہوں

Khalil Ur Rehman Qamar

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مری رستے ہے وہ ہے وہ اک موڑ تھا اور ا سے موڑ پر پیڑ تھا ایک برگد کا اونچا شوالہ ج سے کے سائے ہے وہ ہے وہ میرا بے حد سمے بیتا ہے لیکن ہمیشہ یہی ہے وہ ہے وہ نے سوچا کہ رستے ہے وہ ہے وہ یہ موڑ ہی ا سے لیے ہے کہ یہ پیڑ ہے عمر کی آندھیوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ حقیقت پیڑ ایک دن گر گیا تو ہے موڑ لیکن ہے اب تک وہیں کا وہیں دیکھتا ہوں تو آگے بھی رستے ہے وہ ہے وہ ہے وہ ب سے موڑ ہی موڑ ہیں پیڑ کوئی نہیں راستوں ہے وہ ہے وہ مجھے یوں تو مل جاتے ہیں مہرباں پھروں بھی ہر موڑ پر پوچھتا ہے یہ دل حقیقت جو اک چھاؤں تھی کھو گئی ہے ک ہاں

Javed Akhtar

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گھر ہے وہ ہے وہ بیٹھے ہوئے کیا لکھتے ہوں باہر نکلو دیکھو کیا حال ہے دنیا کا یہ کیا عالم ہے سونی آنکھیں ہیں سبھی خوشیوں سے خالی چنو آؤ ان آنکھوں ہے وہ ہے وہ خوشیوں کی چمک ہم لکھ دیں یہ جو ماتھے ہیں اداسی کی لکیروں کے تلے آؤ ان ماتھوں پہ قسمت کی دمک ہم لکھ دیں چہروں سے گہری یہ بیتابی مٹا کے آؤ ان پہ امید کی اک اجلی کرن ہم لکھ دیں دور تک جو ہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ویرانے نظر آتے ہیں آؤ ویرانوں پر اب ایک چمن ہم لکھ دیں لفظ در لفظ سمندر سا بہے موج ب موج بہر نغمات ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہر کوہ ستم حل ہوں جائے دنیا دنیا لگ رہے ایک غزل ہوں جائے

Javed Akhtar

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ये आए दिन के हंगा में ये जब देखो सफ़र करना यहाँ जाना वहाँ जाना इसे मिलना उसे मिलना हमारे सारे लम्हे ऐसे लगते हैं कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले रेलवे-स्टेशन पर जल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडते कोई मुसाफ़िर हों जिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत है कभी लगता है तुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने का ख़याल आए कहाँ इतनी भी फ़ुर्सत है मगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तो कोई उम्मीद चलते चलते जब मुँह मोड़ती है तो कभी कोई ख़ुशी का फूल जब इस दिल में खिलता है कभी जब मुझ को अपने ज़ेहन से कोई ख़याल इन'आम मिलता है कभी जब इक तमन्ना पूरी होने से ये दिल ख़ाली सा होता है कभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता है तो ये एहसास होता है ख़ुशी हो ग़म हो हैरत हो कोई जज़्बा हो इस में जब कहीं इक मोड़ आए तो वहाँ पल भर को सारी दुनिया पीछे छूट जाती है वहाँ पल भर को इस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी की डोरी टूट जाती है मुझे उस मोड़ पर बस इक तुम्हारी ही ज़रूरत है मगर ये ज़िंदगी की ख़ूब-सूरत इक हक़ीक़त है कि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया है तो हर उस मोड़ पर मैं ने तुम्हें हम-राह पाया है

Javed Akhtar

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حقیقت جو کہلاتا تھا دیوا لگ ترا حقیقت جسے حفظ تھا افسا لگ ترا ج سے کی دیواروں پہ آویزاں تھیں تصویریں تری حقیقت جو بے گا لگ ہستی تھا تقریریں تری حقیقت جو خوش تھا تری خوشیوں سے تری غم سے ادا سے دور رہ کے جو سمجھتا تھا حقیقت ہے تری پا سے حقیقت جسے سجدہ تجھے کرنے سے انکار لگ تھا ا سے کو در اصل کبھی تجھ سے کوئی پیار لگ تھا ا سے کی مشکل تھی کہ دشوار تھے ا سے کے رستے جن پہ بے خوف و خطر گھومتے رہزن تھے صدا ا سے کی انا کے در پہ ا سے نے نزدیک تر کے سب اپنی انا کی دولت تیری تحویل ہے وہ ہے وہ رکھوا دی تھی اپنی ذلت کو حقیقت دنیا کی نظر اور اپنی بھی نگا ہوں سے چھپانے کے لیے کامیابی کو تری تری فتوحات تری عزت کو حقیقت تری نام تری شہرت کو اپنے ہونے کا سبب جانتا تھا ہے وجود ا سے کا جدا تجھ سے یہ کب مانتا تھا حقیقت م گر پرخطر راستوں سے آج نکل آیا ہے سمے نے تری برابر لگ صحیح کچھ لگ کچھ اپنا کرم ا سے پہ بھی فرمایا ہے اب اسے تیری ضرورت ہی نہیں ج سے کا دعویٰ تھا کبھی اب حقیقت عقیدت ہی نہیں تیری ت

Javed Akhtar

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गलियाँ और गलियों में गलियाँ छोटे घर नीचे दरवाज़े टाट के पर्दे मैली बद-रंगी दीवारें दीवारों से सर टकराती कोई गाली गलियों के सीने पर बहती गंदी नाली गलियों के माथे पर बहता आवाज़ों का गंदा नाला आवाज़ों की भीड़ बहुत है इंसानों की भीड़ बहुत है कड़वे और कसीले चेहरे बद-हाली के ज़हरस हैं ज़हरीले चेहरे बीमारी से पीले चेहरे मरते चेहरे हारे चेहरे बे-बस और बेचारे चेहरे सारे चेहरे एक पहाड़ी कचरे की और उस पर फिरते आवारा कुत्तों से बच्चे अपना बचपन ढूँड रहे हैं दिन ढलता है इस बस्ती में रहने वाले औरों की जन्नत को अपनी मेहनत दे कर अपने जहन्नम की जानिब अब थके हुए झुँझलाए हुए से लौट रहे हैं एक गली में ज़ंग लगे पीपे रक्खे हैं कच्ची दारू महक रही है आज सवेरे से बस्ती में क़त्ल-ओ-ख़ूँ का चाक़ू-ज़नी का कोई क़िस्सा नहीं हुआ है ख़ैर अभी तो शाम है पूरी रात पड़ी है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे इक दुखता फोड़ा है यूँँ लगता है सारी बस्ती जैसे है इक जलता कढ़ाव यूँँ लगता है जैसे ख़ुदा नुक्कड़ पर बैठा टूटे-फूटे इंसाँ औने-पौने दामों बेच रहा है!

Javed Akhtar

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