"रायगानी-2" जो बात गिनती के कुछ दिनों से शुरू थी वो साल-हा-साल तक चली है कई ज़मानों में बँट गई है मैं इन ज़मानों में लम्हा लम्हा तुम्हारी नज़रों के बिन रहा हूँ मैं अब तलक भी तुम्हारे जाने का बाक़ी नुक़सान गिन रहा हूँ मुझे ज़माना ये कह रहा था कि राइगानी मुबालगा है भला तुम्हारी जुदाई का दुख ज़माँ मकाँ को हिला रहा है भला रिलेटिविटी की साइंस किसी के मुड़ने से मुंसलिक है इन्हें बताओ तुम्हारे जाने का दुख उठा कर फ़क़त अकेला वो मैं नहीं था जो ज़र्रा ज़र्रा बिखर गया था तुम्हारे जाने के कुछ दिनों में हमारा हॉकिंग भी मर गया था और उस की थ्योरी के काले गड्ढे जिन्हें हमेशा तुम्हारी आँखों में देखना था वो मेरे चेहरे पे पड़ गए हैं, वो मेरी आँखों में गड़ गए हैं तुम्हारे जाने के बा'द सब कुछ ही एक अस्सी के ज़ाविए पर पलट गया है कि मेरा होना तुम्हारे होने से मुंसलिक था तुम्हारी आँखों की रौशनी थी तो मैं भी दुनिया में हो रहा था तुम्हारे लहजे के सुर मिले थे तो मैं बना था तुम्हारे हाथों का लम्स हाथों को मिल रहा था तो देखता था हमारे हाथों में एटमों की दफ़ा की कुव्वत कशिश में कैसे बदल रही है पर अब तुम्हारी नज़र कहीं है तुम्हारा लहजा भी अब नहीं है तो तुम बताओ मैं किस तरीक़े से अपनी हस्ती को नैस्ती से जुदा करूँँगा मैं दंग आँखों से सारी दुनिया को देखता हूँ और अपने होने की कोई इल्लत तलाशता हूँ अजीब तरह का बे-निशान बे-मक़ाम दुख है समझने वाले समझ गए थे ये राइगानी है राइगानी तमाम सदियों का ख़ाम दुख है मैं अब हक़ीक़त समझ रहा हूँ तमाम दुख था तमाम दुख है तुम्हें बताऊँ किसी के होने का कोई मक़सद कोई मआ'नी कहीं नहीं है अगर तो नीत्शे नहीं मरा है तो उस से पूछा क्या करेंगे ज़मीं पे रह के पले बढ़ेंगे बका की ख़ातिर लड़े मरेंगे फिर अपने जैसे कई जनेंगे और इस जहाँ से निकल पड़ेंगे जिन्हे जनेंगे वो सब के सब भी यही करेंगे पले बढ़ेंगे लड़े मरेंगे फिर उन के बच्चे और उन के बच्चे ये क्या तमाशा-ए-हा-ओ-हू है ये ज़िंदगी है तो आख थू है
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حقیقت لوگ بے حد خوش قسمت تھے جو عشق کو کام سمجھتے تھے یا کام سے کرنے والے کرتے تھے ہم جیتے جی مصروف رہے کچھ عشق کیا کچھ کام کیا کام عشق کے آڑے آتا رہا اور عشق سے کام الجھتا رہا پھروں آخر تنگ آ کر ہم نے دونوں کو ادھورا چھوڑ دیا
Faiz Ahmad Faiz
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ہے وہ ہے وہ سگریٹ تو نہیں پیتا م گر ہر آنے والے سے پوچھ لیتا ہوں کہ ماچ سے ہے بے حد کچھ ہے جسے ہے وہ ہے وہ پھونک دینا چاہتا ہوں
Gulzar
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راجا بولا رات ہے رانی بولی رات ہے چھپا کے بولا رات ہے منتری بولا رات ہے یہ صبح صبح کی بات ہے
Gorakh Pandey
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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محبوبہ کے نام تو اپنی چٹھیوں ہے وہ ہے وہ میر کے اشعار لکھتی ہے محبت کے بنا ہے زندگی بیکار لکھتی ہے تیرے خط تو عبارت ہیں وفاداری کی قسموں سے جنہیں ہے وہ ہے وہ پیسہ ڈرتا ہوں وہی ہر بار لکھتی ہے تو پیروکار لیلیٰ کی ہے شیریں کی پجارن ہے مگر تو جس پہ بیٹھی ہے حقیقت سونے کا سنگھاسن ہے تیری پلکوں کے مسکارے تیرے ہونٹوں کی یہ لالی یہ تیرے ریشمی کپڑے یہ تیرے کان کی بالی گلے کا یہ چمکتا ہار ہاتھوں کے تیرے کنگن یہ سب کے سب ہے میرے دل میرے احساس کے دشمن کہ ان کے سامنے کچھ بھی نہیں ہے پیار کی قیمت وفا کا مول کیا کیا ہے اعتبار کی قیمت شکستہ کشتیوں ٹوٹی ہوئی پتوار کی قیمت ہے میری جیت سے بڑھکر تو تیری ہار کی قیمت حقیقت خون کے آنسو تجھے جنگل پرستی جاناں تو اپنے فیصلے پر بعد ہے وہ ہے وہ پچھتائےگی جاناں میرے کندھے پہ چھوٹے بھائیوں کی ذمہ داری ہے میرے ماں باپ بوڑھے ہے بہن بھی تو کنواری ہے برہنہ موسموں کے وار کو تو سہ نہ بدلی حویلی چھوڑ کر تو جھونپڑی ہے وہ ہے وہ رہ نہ بدلی بیگانہ غم تیری میری مفلسی کو
Abrar Kashif
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اضطراب ج ہاں ہے وہ ہے وہ اضطراب ہے نہیں نہیں ج ہاں ہی اضطراب ہے ہزار ہاں کواکب و نجوم ہاں یہ کہکشاں سے اتموں کی کوکھ تک مدار در مدار ہر وجود بے قرار ہے یہ مہرو ماہو مشتری سے ہر الیکٹران تک یہ جھوم جھوم گھومنے ہے وہ ہے وہ ج سے طرح کا رقص ہے مجھے سمجھ ہے وہ ہے وہ آ گیا تو ج ہاں تیرا عک سے ہے حقیقت عک سے جو جگہ جگہ قدم قدم ردم پہ ہے جہان لگ عین سر ہے وہ ہے وہ ہے جہان لگ عین سیم پہ ہے جہان لگ ترنموں کی لسٹ ہے وہ ہے وہ سے انتخاب ہے جو تجھ حسین دماغ کے حسین لا شعور ہے وہ ہے وہ بنا ہوں ایسا خواب ہے جہان لگ اضطراب ہے مجھے سمجھ ہے وہ ہے وہ آ گیا تو ہے یہ جہان لگ خالہ مکان زمان کے چند تار سے بنا ہوا ستار ہے ا سے سے کہو کسی طرح ستار دوارکا رہے ا سے سے کہو کے تھوڑی دیر اور بولتی رہے
Sohaib Mugheera Siddiqi
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वहम रात जागी तो कहीं सेहेन मैं सूखे पत्ते चुरमुराए के कोई आया कोई आया है और हम शौक़ के मारे हुए दौड़े आए गो के मालूम है तू है न तेरा साया है हम के देखें कभी दालान कभी सूखा चमन उस पे धीमी सी तमन्ना के पुकारे जाएँ फिर से इक बार तेरी ख़्वाब सी आँखें देखें फिर तेरे हिज्र के हाथों ही भले मारे जाएँ हम तुझे अपनी सदाओं मैं बसाने वाले इतना चीखें के तेरे वहम लिप्पत के रोएं पर तेरे वहम भी तेरी ही तरह क़ातिल हैं सो वही दर्द है जाना कहो कैसे सोएं बस इसी करब के पहलु मैं गुज़ारे हैं पेहेर बस यूँँही ग़म कभी काफी कभी थोड़े आए फिर अचानक किसी लम्हे मैं जो चटख़े पत्ते हम वही शौक़ के मारे हुए दौड़े आए
Sohaib Mugheera Siddiqi
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سانولی کتنے الفاظ ہیں جو مری انگلیوں کے ہر اک پور ہے وہ ہے وہ ہے وہ اک سمندر کی مانند بند ہیں سمندر بے حد ہی غصیلا سمندر سمندر حقیقت جو منتظر ہے کہ کب تری ہونٹوں کے دونوں سرے مسکراہٹ کی کوشش ہے وہ ہے وہ کھچنے لگیں اور رخسار ہے وہ ہے وہ پیچ و خم ڈال دیں ایک شاعر جو آنکھیں مسلنے لگے تو ہنسے اور سمندر ابلنے لگے
Sohaib Mugheera Siddiqi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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