nazmKuch Alfaaz

سال نو یہ ک سے نے فون پہ دی سال نو کی تہنیت مجھ کو تمنا رقص کرتی ہے تخیّل گنگناتا ہے تصور اک نئے احسا سے کی جنت ہے وہ ہے وہ لے آیا نگا ہوں ہے وہ ہے وہ کوئی رنگین چہرہ مسکراتا ہے جبیں کی چھوٹ پڑتی ہے فلک کے ماہ پاروں پر ضیا پھیلی ہوئی ہے سارا عالم جگمگاتا ہے شفق کے نور سے روشن ہیں محرابیں فضاؤں کی سریا کی جبیں زہرہ کا آرِز تیمتماتا ہے پرانی سال کی ٹھٹھری ہوئی پرچھائیاں سمٹیں نئے دن کا نیا سورج پیام عشق پر اٹھتا آتا ہے ز ہے وہ ہے وہ ہے وہ نے پھروں نئے سر سے نیا رخت سفر باندھا خوشی ہے وہ ہے وہ ہر قدم پر آفتاب آنکھیں بچھاتا ہے ہزاروں خواہشیں انگڑائیاں لیتی ہیں سینے ہے وہ ہے وہ ہے وہ جہان آرزو کا ذرہ ذرہ گنگناتا ہے نومی گرا ڈال کر آنکھوں ہے وہ ہے وہ آنکھیں مسکراتی ہیں زما لگ جنبش مژگاں سے افسانے سناتا ہے مسرت کے جواں ملاح کشتی لے کے نکلے ہیں غموں کے نا خداوں کا سفی لگ ڈگمگاتا ہے خوشی مجھ کو بھی ہے لیکن ہے وہ ہے وہ یہ محسو سے کرتا ہوں مسرت کے ا سے آئینے ہے وہ ہے وہ غم بھی جھلمیلاتا ہے <

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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کیوں ہے جاناں نہیں ہوں ی ہاں پر پھروں بھی تمہارے ہونے کا احسا سے کیوں ہے کچھ ہے نہیں مری ہاتھ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں بھی کچھ ہونے کی یہ آ سے کیوں ہے بڑی حیرانی ہے مجھے کی حقیقت دور ہوکر بھی اتنا پا سے کیوں ہے سب نے کہا کہ حقیقت تو پرایا ہے حقیقت پرایا ہوکر بھی اتنا خاص کیوں ہے جتنا حقیقت دور ہے مجھ سے حقیقت اتنا ہی مجھ کو را سے کیوں ہے بیٹھا ہوں بلکل اکانت ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ ہے وہ پھروں بھی کانوں ہے وہ ہے وہ ا سے کی آواز کیوں ہے کھل کے نہیں کہتی حقیقت کچھ بھی ا سے کی آنکھوں ہے وہ ہے وہ اتنے راز کیوں ہیں بسی ہے دل ہے وہ ہے وہ حقیقت مری یہ میرا دل ا سے کا سمپتی کیوں ہے اس کا کا کو نہیں بھلا سکتا ہے وہ ہے وہ ہے وہ یہ ا سے کے نام کی ہر شوا سے کیوں ہے پوری کائنات ا سے کی یاد دلاتی ہے یہ تن من ہے وہ ہے وہ ا سے کا وا سے کیوں ہے حقیقت مری ہوئی نہیں ہے ابھی اس کا کا کو کھونے کے ڈر سے من اتنا بدحوا سے کیوں ہے دوریاں لکھی ہیں چنو درمیان میرا نصیب مجھ سے اتنا ناراض کیوں ہے ایسے شبد ک ہاں سے لاؤں کی حقیقت سمجھے

Divya 'Kumar Sahab'

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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یاد ہے پہلے روز کہا تھا یاد ہے پہلے روز کہا تھا پھروں نہ کہنا غلطی دل کی پیار سمجھ کے کرنا لڑکی پیار نبھانا ہوتا ہے پھروں پار لگانا ہوتا ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا ساتھ چلو تو پورے سفر تک مر جانے کی اگلی خبر تک سمجھو یار خدا تک ہوگا سارا پیار وفا تک ہوگا پھروں یہ بندھن توڑ نہ جانا چھوڑ گئے تو پھروں نہ آنا چھوڑ دیا جو تیرا نہیں ہے چلا گیا جو میرا نہیں ہے یاد ہے پہلے روز کہا تھا یا تو ٹوٹ کے پیار نہ کرنا یا پھروں پیٹھ پہ وار نہ کرنا جب نادانی ہو جاتی ہے نئی کہانی ہو جاتی ہے نئی کہانی لکھ لاوں گا اگلے روز میں بک جاؤں گا تیرے گل جب کھیل جائیں گے مجھ کو پیسے مل جائیں گے یاد ہے پہلے روز کہا تھا بچھڑ گئے تو موج اڑانا واپس میرے پاس نہ آنا جب کوئی جا کر واپس آئے روئے تڑپے یا پچھتائے میں پھروں اس کو ملتا نہیں ہوں ساتھ دوبارہ چلتا نہیں ہوں گم جاتا ہوں کھو جاتا ہوں میں پتھر کا ہو جاتا ہوں

Khalil Ur Rehman Qamar

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رمز جاناں جب آوگی تو کھویا ہوا پاؤ گی مجھے مری تنہائی ہے وہ ہے وہ خوابوں کے سوا کچھ بھی نہیں مری کمرے کو سجانے کی تمنا ہے تمہیں مری کمرے ہے وہ ہے وہ کتابوں کے سوا کچھ بھی نہیں ان کتابوں نے بڑا ظلم کیا ہے مجھ پر ان ہے وہ ہے وہ اک رمز ہے ج سے رمز کا مارا ہوا ذہن مژدہ عشرت انجام نہیں پا سکتا زندگی ہے وہ ہے وہ کبھی آرام نہیں پا سکتا

Jaun Elia

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پوچھتا ہے تو کہ کب اور ک سے طرح آتی ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ گود ہے وہ ہے وہ ناکامیوں کے پرورش پاتی ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ صرف حقیقت مخصوص سینے ہیں مری آرام گاہ آرزو کی طرح رہ جاتی ہے جن ہے وہ ہے وہ گھٹ کے آہ اہل غم کے ساتھ ان کا درد و غم سہتی ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ کانپتے ہونٹوں پہ بن کر بد دعا رہتی ہوں ہے وہ ہے وہ ہے وہ رقص کرتی ہیں اشاروں پر مری موت و حیات دیکھتی رہتی ہوں ہے وہ ہے وہ ہر سمے نبض کائنات خود فریبی بڑھ کے جب بنتی ہے احسا سے شعور جب جواں ہوتا ہے اہل زر کے تیور ہے وہ ہے وہ غرور کسانوں سے کرتے ہیں جب آدمیت کو جدا جب لہو پیتے ہیں تہذیب و تمدن کے خدا بھوت بن کر ناچتا ہے سر پہ جب قومی نظیر و لے کے مذہب کی سپر آتا ہے جب سرمایہ دار راستے جب بند ہوتے ہیں دعاؤں کے لیے آدمی لڑتا ہے جب جھوٹے خداؤں کے لیے زندگی انساں کی کر دیتا ہے جب انساں حرام جب اسے قانون فطرت کا عطا ہوتا ہے نام اہرمہن پھرتا ہے جب اپنا دہن کھولے ہوئے آ سماں سے موت جب آتی ہے پر تولے ہوئے جب بیوقوفی کی نگا ہوں سے تھمتا

Ali Sardar Jafri

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ग़ुलाम तुम भी थे यारों ग़ुलाम हम भी थे नहा के ख़ून में आई थी फ़स्ले-आज़ादी मज़ा तो तब था कि जब मिल कर इलाज-ए-जां करते ख़ुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलसितां करते हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक़ होते तो जश्न-ए-आशियां करते तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बर्दोश हम आएँ सुब्ह-ए-बनारस की रौशनी ले कर हिमालय की हवाओं की ताज़गी ले कर और उस के बा'द ये पूछें कौन दुश्मन है ?

Ali Sardar Jafri

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फिर इक दिन ऐसा आएगा आँखों के दीए बुझ जाएँगे हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे और बर्ग-ए-ज़बांसे नुत्क़ ओ सदा की हर तितली उड़ जाएगी इक काले समुंदर की तह में कलियों की तरह से खिलती हुई फूलों की तरह से हंसती हुई सारी शक्लें खो जाएंगी ख़ूंकी गर्दिश दिल की धड़कन सब रागनियां सो जाएंगी और नीली फ़ज़ा की मख़मल पर हंसती हुई हीरे की ये कनी ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं इस की सुब्हें इस की शा में बे-जाने हुए बे-समझे हुए इक मुश्त-ए-ग़ुबार-ए-इंसांपर शबनम की तरह रो जाएंगी हर चीज़ भुला दी जाएगी यादों के हसीं बुत-ख़ाने से हर चीज़ उठा दी जाएगी फिर कोई नहीं ये पूछेगा 'सरदार' कहाँ है महफ़िल में लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा बच्चों के दहन से बोलूंगा चिड़ियों की ज़बां से गाऊंगा जब बीज हंसेंगे धरती में और कोंपलें अपनी उँगली से मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी मैं पत्ती पत्ती कली कली अपनी आँखें फिर खोलूंगा सरसब्ज़ हथेली पर ले कर शबनम के क़तरे तौलूंगा मैं रंग-ए-हिना आहंग-ए-ग़ज़ल अंदाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा रुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह हर आंचल से छिन जाऊँगा जाड़ों की हवाएंदामन में जब फ़स्ल-ए-ख़िज़ांको लाएंगी रह-रौ के जवां क़दमों के तले सूखे हुए पत्तों से मेरे हँसने की सदाएंआएंगी धरती की सुनहरी सब नदियाँ आकाश की नीली सब झीलें हस्ती से मिरी भर जाएंगी और सारा ज़माना देखेगा हर क़िस्सा मिरा अफ़्साना है हर आशिक़ है 'सरदार' यहाँ हर माशूक़ा 'सुलताना' है मैं एक गुरेज़ांलम्हा हूँ अय्याम के अफ़्सूं-ख़ाने में मैं एक तड़पता क़तरा हूँ मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता है माज़ी की सुराही के दिल से मुस्तक़बिल के पैमाने में मैं सोता हूंऔर जागता हूँ और जाग के फिर सो जाता हूँ सदियों का पुराना खेल हूं मैं मैं मर के अमर हो जाता हूँ

Ali Sardar Jafri

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اٹھو ہند کے باغبانو اٹھو اٹھو انقلابی جوانو اٹھو بیوقوفی اٹھو کام گارو اٹھو نئی زندگی کے شرارو اٹھو اٹھو کھیلتے اپنی زنجیر سے اٹھو خاک بنگال و کشمیر سے اٹھو وا گرا و دشت و کوہسار سے اٹھو سندھ و پنجاب و ملبار سے اٹھو مالوے اور میوات سے مہاراشٹر اور گجرات سے اودھ کے چمن سے چہکتے اٹھو گلوں کی طرح سے مہکتے اٹھو اٹھو کھل گیا تو پرچم انقلاب نکلتا ہے ج سے طرح سے آفتاب اٹھو چنو دریا ہے وہ ہے وہ اٹھتی ہے موج اٹھو چنو آندھی کی بڑھتی ہے فوج اٹھو برق کی طرح ہنستے ہوئے کڑکتے گرجتے برستے ہوئے غلامی کی زنجیر کو توڑ دو زمانے کی رفتار کو موڑ دو

Ali Sardar Jafri

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