sherKuch Alfaaz

फ़िलहाल मेरे ग़म की दवा कुछ भी नहीं है सब ठीक नहीं और हुआ कुछ भी नहीं है तुम भी वही हम भी वही हालात वही हैं हर बात पुरानी है नया कुछ भी नहीं है

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वो इक नदी जो कभी तेज़-तेज़ बहती थी वो आज रेत के मैदान सी बिछी हुई है मैं इक दरख़्त था 'अशरफ़' किसी ज़माने में खिज़ां के कहरस अब ठूँठ ही बची हुई है

Ashraf Ali

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पुतलियों में घुला समुंदर है मोतियों की दुकान आँखें हैं आप तहक़ीक़ ही नहीं करते सब ख़ज़ानों की खान आँखें हैं

Ashraf Ali

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जो भी मुझ में बाक़ी है गड़बड़ी निकालूँगा चाबियाँ बनाऊँगा, हथकड़ी निकालूँगा ये जो तुम शरीफ़ों को धौंस देते फिरते हो एक दिन तुम्हारी भी हेकड़ी निकालूँगा

Ashraf Ali

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सारी दुनिया को अजनबी कर के ख़ुश हूँ ख़ल्वत से दोस्ती कर के

Ashraf Ali

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बात आगे बढ़ चुकी है बस ज़रा सी बात पर उँगलियाँ उठने लगी हैं अब हमारी ज़ात पर अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ ही तुम्हें करता हूँ याद मैं ने क़ाबू पा लिया है नफ़्स पर जज़्बात पर

Ashraf Ali

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