मुझ से दामन न छुड़ा मुझ को बचा कर रख ले मुझ से इक रोज़ तुझे प्यार भी हो सकता है

Writer
Khalil Ur Rehman Qamar
@khalil-ur-rehman-qamar
5
Sher
3
Ghazal
2
Nazm
अपनी आँखों में 'क़मर' झाँक के कैसे देखूँ मुझ से देखे हुए मंज़र नहीं देखे जाते
लफ़्ज़ कितने ही तेरे पैरों से लिपटे होंगे तू ने जब आख़िरी ख़त मेरा जलाया होगा
एक चेहरे से उतरती हैं नक़ाबें कितनी लोग कितने हमें इक शख़्स में मिल जाते हैं
वक़्त बदलेगा तो इस बार मैं पूछूँगा उसे तुम बदलते हो तो क्यूँँ लोग बदल जाते हैं
तेरे दिल के निकाले हम कहाँ भटके कहाँ पहुँचे मगर भटके तो याद आया भटकना भी ज़रूरी था
ख़्वाब पलकों की हथेली पे चुने रहते हैं कौन जाने वो कभी नींद चुराने आए
ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना था वो ख़्वाब में भी मिले मैं नींद नींद को तरसा मगर नहीं सोया
मैं समझा था तुम हो तो क्या और माँगू मेरी ज़िन्दगी में मेरी आस तुम हो
तुम भी वैसे थे मगर तुम को ख़ुदा रहने दिया इस तरह तुम को ज़माने से जुदा रहने दिया
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