थोड़ा उलझे मसाइल-ए-दिल में कुछ परेशाँ दिमाग़ ने किया था रात से जंग जीत जाते मगर ये अँधेरा चराग़ ने किया था
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तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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उसे हर वक़्त करता हूँ महसूस वो जिसे आज तक छुआ ही नहीं
Prit
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यहाँ सब मेरे दोस्त हैं या'नी यहाँ कोई भी मेरा दोस्त नहीं
Prit
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पूरे होश-ओ-हवा से में हूँ और इक अजब क़ैफियत भी तारी है ऐ कज़ा ज़िंदा छोड़ना उन को जिन को जीने में मौत आ रही है
Prit
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कभी ब्याही थी बेटियाँ हम ने कभी की थी ज़कात फूलों की
Prit
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अपना किरदार काम आया नहीं बदचलन नौकरी जो करता था
Prit
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