ab ke barish men to ye kar-e-ziyan hona hi tha apni kachchi bastiyon ko be-nishan hona hi tha kis ke bas men tha hava ki vahshaton ko rokna barg-e-gul ko khaak shoale ko dhuan hona hi tha jab koi samt-e-safar tai thi na hadd-e-rahguzar ai mire rah-rau safar to raegan hona hi tha mujh ko rukna tha use jaana tha agle mod tak faisla ye us ke mere darmiyan hona hi tha chand ko chalna tha bahti sipiyon ke saath saath moajiza ye bhi tah-e-ab-e-ravan hona hi tha main nae chehron pe kahta tha nai ghhazlen sada meri is aadat se us ko bad-guman hona hi tha shahr se bahar ki virani basana thi mujhe apni tanhai pe kuchh to mehrban hona hi tha apni ankhen dafn karna thiin ghhubar-e-khak men ye sitam bhi ham pe zer-e-asman hona hi tha be-sada basti ki rasmen thiin yahi 'mohsin' mire main zaban rakhta tha mujh ko be-zaban hona hi tha ab ke barish mein to ye kar-e-ziyan hona hi tha apni kachchi bastiyon ko be-nishan hona hi tha kis ke bas mein tha hawa ki wahshaton ko rokna barg-e-gul ko khak shoale ko dhuan hona hi tha jab koi samt-e-safar tai thi na hadd-e-rahguzar ai mere rah-rau safar to raegan hona hi tha mujh ko rukna tha use jaana tha agle mod tak faisla ye us ke mere darmiyan hona hi tha chand ko chalna tha bahti sipiyon ke sath sath moajiza ye bhi tah-e-ab-e-rawan hona hi tha main nae chehron pe kahta tha nai ghazlen sada meri is aadat se us ko bad-guman hona hi tha shahr se bahar ki virani basana thi mujhe apni tanhai pe kuchh to mehrban hona hi tha apni aankhen dafn karna thin ghubar-e-khak mein ye sitam bhi hum pe zer-e-asman hona hi tha be-sada basti ki rasmen thin yahi 'mohsin' mere main zaban rakhta tha mujh ko be-zaban hona hi tha
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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नया है शहर नए आसरे तलाश करूँँ तू खो गया है कहाँ अब तुझे तलाश करूँँ जो दश्त में भी जलाते थे फ़स्ल-ए-गुल के चराग़ मैं शहर में भी वही आबले तलाश करूँँ तू अक्स है तो कभी मेरी चश्म-ए-तर में उतर तिरे लिए मैं कहाँ आइने तलाश करूँँ तुझे हवा से की आवारगी का इल्म कहाँ कभी मैं तुझ को तिरे सामने तलाश करूँँ ग़ज़ल कहूँ कभी सादास ख़त लिखूँ उस को उदास दिल के लिए मश्ग़ले तलाश करूँँ मिरे वजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा कभी मैं ख़ुद को तिरे वास्ते तलाश करूँँ मैं चुप रहूँ कभी बे-वज्ह हँस पड़ूँ 'मोहसिन' उसे गँवा के अजब हौसले तलाश करूँँ
Mohsin Naqvi
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मैं दिल पे जब्र करूँँगा तुझे भुला दूँगा मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा ये तीरगी मिरे घर का ही क्यूँँ मुक़द्दर हो मैं तेरे शहर के सारे दिए बुझा दूँगा हवा का हाथ बटाऊँगा हर तबाही में हरे शजर से परिंदे मैं ख़ुद उड़ा दूँगा वफ़ा करूँँगा किसी सोगवार चेहरे से पुरानी क़ब्र पे कतबा नया सजा दूँगा इसी ख़याल में गुज़री है शाम-ए-दर्द अक्सर कि दर्द हद से बढ़ेगा तो मुस्कुरा दूँगा तू आसमान की सूरत है गर पड़ेगा कभी ज़मीं हूँ मैं भी मगर तुझ को आसरा दूँगा बढ़ा रही हैं मिरे दुख निशानियाँ तेरी मैं तेरे ख़त तिरी तस्वीर तक जला दूँगा बहुत दिनों से मिरा दिल उदास है 'मोहसिन' इस आइने को कोई अक्स अब नया दूँगा
Mohsin Naqvi
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हवा-ए-हिज्र में जो कुछ था अब के ख़ाक हुआ कि पैरहन तो गया था बदन भी चाक हुआ अब उस से तर्क-ए-त'अल्लुक़ करूँँ तो मर जाऊँ बदन से रूह का इस दर्जा इश्तिराक हुआ यही कि सब की कमानें हमीं पे टूटी हैं चलो हिसाब-ए-सफ़-ए-दोस्ताँ तो पाक हुआ वो बे-सबब यूँँही रूठा है लम्हा-भर के लिए ये सानेहा न सही फिर भी कर्ब-नाक हुआ उसी के क़ुर्ब ने तक़्सीम कर दिया आख़िर वो जिस का हिज्र मुझे वज्ह-ए-इंहिमाक हुआ शदीद वार न दुश्मन दिलेर था 'मोहसिन' मैं अपनी बे-ख़बरी से मगर हलाक हुआ
Mohsin Naqvi
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अब वो तूफ़ाँ है न वो शोर हवाओं जैसा दिल का आलम है तेरे बा'द ख़लाओं जैसा काश दुनिया मेरे एहसास को वापस कर दे ख़ामुशी का वही अंदाज़ सदाओं जैसा पास रह कर भी हमेशा वो बहुत दूर मिला उस का अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल था ख़ुदाओं जैसा कितनी शिद्दत से बहारों को था एहसास-ए-मआ'ल फूल खिल कर भी रहा ज़र्द ख़िज़ाओं जैसा क्या क़यामत है कि दुनिया उसे सरदार कहे जिस का अंदाज़-ए-सुख़न भी हो गदाओं जैसा फिर तेरी याद के मौसम ने जगाए महशर फिर मेरे दिल में उठा शोर हवाओं जैसा बारहा ख़्वाब में पा कर मुझे प्यासा 'मोहसिन' उस की ज़ुल्फ़ों ने किया रक़्स घटाओं जैसा
Mohsin Naqvi
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जब से उस ने शहर को छोड़ा हर रस्ता सुनसान हुआ अपना क्या है सारे शहर का इक जैसा नुक़सान हुआ ये दिल ये आसेब की नगरी मस्कन सोचूँ वहमों का सोच रहा हूँ इस नगरी में तू कब से मेहमान हुआ सहरा की मुँह-ज़ोर हवाएँ औरों से मंसूब हुईं मुफ़्त में हम आवारा ठहरे मुफ़्त में घर वीरान हुआ मेरे हाल पे हैरत कैसी दर्द के तन्हा मौसम में पत्थर भी रो पड़ते हैं इंसान तो फिर इंसान हुआ इतनी देर में उजड़े दिल पर कितने महशर बीत गए जितनी देर में तुझ को पा कर खोने का इम्कान हुआ कल तक जिस के गिर्द था रक़्साँ इक अम्बोह सितारों का आज उसी को तन्हा पा कर मैं तो बहुत हैरान हुआ उस के ज़ख़्म छुपा कर रखिए ख़ुद उस शख़्स की नज़रों से उस से कैसा शिकवा कीजे वो तो अभी नादान हुआ जिन अश्कों की फीकी लौ को हम बे-कार समझते थे उन अश्कों से कितना रौशन इक तारीक मकान हुआ यूँँ भी कम-आमेज़ था 'मोहसिन' वो इस शहर के लोगों में लेकिन मेरे सामने आ कर और भी कुछ अंजान हुआ
Mohsin Naqvi
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