सुना है शहर में ज़ख़्मी दिलों का मेला है चलेंगे हम भी मगर पैरहन रफ़ू कर के

Writer
Mohsin Naqvi
@mohsin-naqvi
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1
Sher
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Ghazal
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Nazm
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मिरे ग़म का सबब सहरा की भीगी रेत पर मैं ने लिखा आवारगी
sherKuch Alfaaz
खुली हैं आँखें मगर बदन है तमाम पत्थर कोई बताए मैं मर चुका हूँ कि जी रहा हूँ
sherKuch Alfaaz
अब एक पल का तग़ाफ़ुल भी सह नहीं सकते हम अहल-ए-दिल कभी आदी थे इंतिज़ार के भी
sherKuch Alfaaz
हर वक़्त का हँसना तुझे बर्बाद न कर दे तन्हाई के लम्हों में कभी रो भी लिया कर
sherKuch Alfaaz
ज़बाँ रखता हूँ लेकिन चुप खड़ा हूँ मैं आवाज़ों के बन में घिर गया हूँ
sherKuch Alfaaz
यूँँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं 'मोहसिन' वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें
sherKuch Alfaaz
कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो
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