ghazalKuch Alfaaz

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए इश्क़-ओ-हवस हैं सब फ़रेब आप से क्या छुपाइए उस ने कहा कि याद हैं रंग तुलू-ए-इश्क़ के मैं ने कहा कि छोड़िए अब उन्हें भूल जाइए कैसे नफ़ीस थे मकाँ साफ़ था कितना आसमाँ मैं ने कहा कि वो समाँ आज कहाँ से लाइए कुछ तो सुराग़ मिल सके मौसम-ए-दर्द-ए-हिज्र का संग-ए-जमाल-ए-यार पर नक़्श कोई बनाइए कोई शरर नहीं बचा पिछले बरस की राख में हम-नफ़्सान-ए-शो'ला-ख़ू आग नई जलाइए

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को

Ahmad Mushtaq

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ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं ख़ाली काग़ज़ पर लकीरें खींचता रहता हूँ मैं आज से मुझ पर मुकम्मल हो गया दीन-ए-फ़िराक़ हाँ तसव्वुर में भी अब तुझ से जुदा रहता हूँ मैं तू दयार-ए-हुस्न है ऊँची रहे तेरी फ़सील मैं हूँ दरवाज़ा मोहब्बत का, खुला रहता हूँ मैं शाम तक खींचे लिए फिरते हैं इस दुनिया के काम सुब्ह तक फ़र्श-ए-नदामत पर पड़ा रहता हूँ मैं हाँ कभी मुझ पर भी हो जाता है मौसम का असर हाँ किसी दिन शाकी-ए-आब-ओ-हवा रहता हूँ मैं अहल-ए-दुनिया से तअ'ल्लुक़ क़त्अ होता ही नहीं भूल जाने पर भी सूरत-आश्ना रहता हूँ मैं

Ahmad Mushtaq

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किस झुट-पुटे के रंग उजालों में आ गए टुकड़े शफ़क़ के धूप से गालों में आ गए अफ़्सुर्दगी की लय भी तिरे क़हक़हों में थी पतझड़ के सुर बहार के झालों में आ गए उड़ कर कहाँ कहाँ से परिंदों के क़ाफ़िले नादीदा पानियों के ख़यालों में आ गए हुस्न-ए-तमाम थे तो कोई देखता न था तुम दर्द बन के देखने वालों में आ गए काँटे समझ के घास पे चलता रहा हूँ मैं क़तरे तमाम ओस के छालों में आ गए कुछ रत-जगे थे जिन की ज़रूरत नहीं रही कुछ ख़्वाब थे जो मेरे ख़यालों में आ गए

Ahmad Mushtaq

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ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब पुकारता हूँ तो देते नहीं सदा मिरे लब ये और बात किसी के लबों तलक न गए मगर क़रीब से गुज़रे हैं बार-हा मिरे लब अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है वो जिस के नाम से होते न थे जुदा मिरे लब अब एक उमर से गुफ़्त-ओ-शुनीद भी तो नहीं हैं बे-नसीब मिरे कान बे-नवा मिरे लब ये शाख़साना-ए-वहम-ओ-गुमान था शायद कुजा वो समरा-ए-बाग़-ए-तलब कुजा मिरे लब

Ahmad Mushtaq

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कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है कि थरथरी सी अजब जिस्म-ओ-जाँ में रहती है क़दम क़दम पे वही चश्म ओ लब वही गेसू तमाम उम्र नज़र इम्तिहाँ में रहती है मज़ा तो ये है कि वो ख़ुद तो है नए घर में और उस की याद पुराने मकाँ में रहती है पता तो फ़स्ल-ए-गुल-ओ-लाला का नहीं मालूम सुना है क़ुर्ब-ओ-जवार-ए-ख़िज़ाँ में रहती है मैं कितना वहम करूँँ लेकिन इक शुआ-ए-यक़ीं कहीं नवाह-ए-दिल-ए-बद-गुमाँ में रहती है हज़ार जान खपाता रहूँ मगर फिर भी कमी सी कुछ मिरे तर्ज़-ए-बयाँ में रहती है

Ahmad Mushtaq

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