क्यूँँ मेरे साथ कोई और परेशान रहे मेरी दुनिया है जो वीरान तो वीरान रहे

Writer
Javed Akhtar
@javed-akhtar
6
Sher
21
Ghazal
31
Nazm
जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता
मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी
हमें जब से मोहब्बत हो गई है ये दुनिया ख़ूब-सूरत हो गई है
ख़ून से सींची है मैं ने जो ज़मीं मर मर के वो ज़मीं एक सितम-गर ने कहा उस की है
कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए क्या समाई थी भला दीवाने के सर देखिए
फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है फिर ख़यालात ने ली अँगड़ाई
ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे बहुत से ज़र्द चेहरों पर ग़ुबार-ए-ग़म है कम बे-शक पर उन को मुस्कुराने में अभी कुछ दिन लगेंगे
इन चराग़ों में तेल ही कम था क्यूँँ गिला फिर हमें हवा से रहे
मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है
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