ghazalKuch Alfaaz

अदू के ताकने को तुम इधर देखो उधर देखो मगर हम तुम को देखे जाएँ तुम चाहो जिधर देखो लड़ाई से यूँ ही तो रोकते रहते हैं हम तुम को कि दिल का भेद कह देती है तुम चाहो जिधर देखो अदाएं देखने बैठे हो क्या आईने में अपनी दिया है जिस ने तुम जैसे को दिल उस का जिगर देखो सवाल-ए-वस्ल पर कुछ सोच कर उस ने कहा मुझ से अभी वा'दा तो कर सकते नहीं हैं हम मगर देखो न करना तर्क 'बे-ख़ुद' मोहतसिब के डर से मय-ख़्वारी कहीं धब्बा लगा लेना न अपने नाम पर देखो

Related Ghazal

ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

292 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

196 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

More from Bekhud Dehelvi

आशिक़ हैं मगर इश्क़ नुमायां नहीं रखते हम दिल की तरह गिरेबां नहीं रखते सर रखते हैं सर में नहीं सौदा-ए-मोहब्बत दिल रखते हैं दिल में कोई अरमां नहीं रखते नफ़रत है कुछ ऐसी उन्हें आशुफ़्ता-सरों से अपनी भी वो ज़ुल्फों को परेशां नहीं रखते रखने को तो रखते हैं ख़बर सारे जहाँ की इक मेरे ही दिल की वो ख़बर हाँ नहीं रखते घर कर गईं दिल में वो मोहब्बत की निगाहें उन तीरों का जख़्मी हूँ जो पैकां नहीं रखते दिल दे कोई तुम को तो किस उम्मीद पर अब दे तुम दिल तो किसी का भी मेरी जाँ नहीं रखते रहता है निगह-बान मेरा उन का तसव्वुर वो मुझ को अकेला शब-ए-हिज्रां नहीं रखते दुश्मन तो बहुत हज़रत-ए-नासेह हैं हमारे हाँ दोस्त कोई आप सा नादां नहीं रखते दिल हो जो परेशान तो दम भर भी ने ठहरे कुछ बाँध के तो गेसू-ए-पेचां नहीं रखते गो और भी आशिक़ हैं ज़माने में बहुत से ‘बे-ख़ुद की तरह इश्क़ को पिन्हाँ नहीं रखते

Bekhud Dehelvi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Bekhud Dehelvi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Bekhud Dehelvi's ghazal.