apni dhun men rahta huun main bhi tere jaisa huun o pichhli rut ke sathi ab ke baras main tanha huun teri gali men saara din dukh ke kankar chunta huun mujh se aankh milae kaun main tera aina huun mera diya jalae kaun main tira khali kamra huun tere siva mujhe pahne kaun main tire tan ka kapda huun tu jivan ki bhari gali main jangal ka rasta huun aati rut mujhe roegi jaati rut ka jhonka huun apni lahr hai apna rog dariya huun aur pyasa huun apni dhun mein rahta hun main bhi tere jaisa hun o pichhli rut ke sathi ab ke baras main tanha hun teri gali mein sara din dukh ke kankar chunta hun mujh se aankh milae kaun main tera aaina hun mera diya jalae kaun main tera khali kamra hun tere siwa mujhe pahne kaun main tere tan ka kapda hun tu jiwan ki bhari gali main jangal ka rasta hun aati rut mujhe roegi jati rut ka jhonka hun apni lahr hai apna rog dariya hun aur pyasa hun
Related Ghazal
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
406 likes
ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
355 likes
वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
244 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
More from Nasir Kazmi
शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ यूँँ तेरे ध्यान से लरज़ता हूँ जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ उन उजालों की धुन में फिरता हूँ छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ रैन अँधेरी है और किनारा दूर चाँद निकले तो पार उतर जाएँ
Nasir Kazmi
1 likes
दिल में और तो क्या रक्खा है तेरा दर्द छुपा रक्खा है इतने दुखों की तेज़ हवा में दिल का दीप जला रक्खा है धूप से चेहरों ने दुनिया में क्या अंधेर मचा रक्खा है इस नगरी के कुछ लोगों ने दुख का नाम दवा रक्खा है वादा-ए-यार की बात न छेड़ो ये धोका भी खा रक्खा है भूल भी जाओ बीती बातें इन बातों में क्या रक्खा है चुप चुप क्यूँँ रहते हो 'नासिर' ये क्या रोग लगा रक्खा है
Nasir Kazmi
11 likes
मुसलसल बेकली दिल को रही है मगर जीने की सूरत तो रही है मैं क्यूँँ फिरता हूँ तन्हा मारा मारा ये बस्ती चैन से क्यूँँ सो रही है चले दिल से उम्मीदों के मुसाफ़िर ये नगरी आज ख़ाली हो रही है न समझो तुम इसे शोर-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ पत्तों में छुप कर रो रही है हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है
Nasir Kazmi
2 likes
मैं ने जब लिखना सीखा था पहले तेरा नाम लिखा था मैं वो सब्र-ए-समीम हूँ जिस ने बार-ए-अमानत सर पे लिया था मैं वो इस्म-ए-अज़ीम हूँ जिस को जिन्न-ओ-मलक ने सज्दा किया था तू ने क्यूँँ मिरा हाथ न पकड़ा मैं जब रस्ते से भटका था जो पाया है वो तेरा है जो खोया वो भी तेरा था तुझ बिन सारी उम्र गुज़ारी लोग कहेंगे तू मेरा था पहली बारिश भेजने वाले मैं तिरे दर्शन का प्यासा था
Nasir Kazmi
9 likes
जब ज़रा तेज़ हवा होती है कैसी सुनसान फ़ज़ा होती है हम ने देखे हैं वो सन्नाटे भी जब हर इक साँस सदा होती है दिल का ये हाल हुआ तेरे बा'द जैसे वीरान सरा होती है रोना आता है हमें भी लेकिन इस में तौहीन-ए-वफ़ा होती है मुँह-अँधेरे कभी उठ कर देखो क्या तर ओ ताज़ा हवा होती है अजनबी ध्यान की हर मौज के साथ किस क़दर तेज़ हवा होती है ग़म के बे-नूर गुज़रगाहों में इक किरन ज़ौक़-फ़ज़ा होती है ग़म-गुसार-ए-सफ़र-ए-राह-ए-वफ़ा मिज़ा-ए-आबला-पा होती है गुलशन-ए-फ़िक्र की मुँह-बंद कली शब-ए-महताब में वा होती है जब निकलती है निगार-ए-शब-ए-गुल मुँह पे शबनम की रिदा होती है हादसा है कि ख़िज़ाँ से पहले बू-ए-गुल गुल से जुदा होती है इक नया दौर जनम लेता है एक तहज़ीब फ़ना होती है जब कोई ग़म नहीं होता 'नासिर' बेकली दिल की सिवा होती है
Nasir Kazmi
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Nasir Kazmi.
Similar Moods
More moods that pair well with Nasir Kazmi's ghazal.







