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बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो इश्क़-पेचे की तरह हुस्न-ए-गिरफ़्तारी है लुत्फ़ क्या सर्व की मानिंद गर आज़ाद रहो हम को दीवानगी शहरों ही में ख़ुश आती है दश्त में क़ैस रहो कोह में फ़रहाद रहो वो गराँ ख़्वाब जो है नाज़ का अपने सो है दाद बे-दाद रहो शब को कि फ़रियाद रहो 'मीर' हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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ख़त लिख के कोई सादा न उस को मलूल हो हम तो हूँ बद-गुमान जो क़ासिद-ए-रसूल हो चाहूँ तो भर के कौली उठा लूँ अभी तुम्हें कैसे ही भारी हो मिरे आगे तो फूल हो सुर्मा जो नूर बख़्शे है आँखों को ख़ल्क़ की शायद कि राह-ए-यार की ही ख़ाक धूल हो जावें निसार होने को हम किस बिसात पर इक नीम जाँ रखें हैं सो वो जब क़ुबूल हो हम इन दिनों में लग नहीं पड़ते हैं सुब्ह-ओ-शाम वर्ना दुआ करें तो जो चाहें हुसूल हो दिल ले के लौंडे दिल्ली के कब का पचा गए अब उन से खाई पी हुई शय किया वसूल हो नाकाम इस लिए हो कि चाहो हो सब कुछ आज तुम भी तो 'मीर' साहिब-ओ-क़िबला अजूल हो

Meer Taqi Meer

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तंग आए हैं दिल उस जी से उठा बैठेंगे भूखों मरते हैं कुछ अब यार भी खा बैठेंगे अब के बिगड़ेगी अगर उन से तो इस शहर से जा कसो वीराने में तकिया ही बना बैठेंगे मा'रका गर्म तो टक होने दो ख़ूँ-रेज़ी का पहले तलवार के नीचे हमीं जा बैठेंगे होगा ऐसा भी कोई रोज़ कि मज्लिस से कभू हम तो एक-आध घड़ी उठ के जुदा बैठेंगे जा न इज़हार-ए-मोहब्बत पे हवसनाकों की वक़्त के वक़्त ये सब मुँह को छुपा बैठेंगे देखें वो ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद कहाँ जाता है अब सर-ए-राह दम-ए-सुब्ह से आ बैठेंगे भीड़ टलती ही नहीं आगे से उस ज़ालिम के गर्दनें यार किसी रोज़ कटा बैठेंगे कब तलक गलियों में सौदाई से फिरते रहिए दिल को उस ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल से लगा बैठेंगे शोला-अफ़्शाँ अगर ऐसी ही रही आह तो 'मीर' घर को हम अपने कसो रात जला बैठेंगे

Meer Taqi Meer

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मक्का गया मदीना गया कर्बला गया जैसा गया था वैसा ही चल फिर के आ गया देखा हो कुछ उस आमद-ओ-शुद में तो मैं कहूँ ख़ुद गुम हुआ हूँ बात की तह अब जो पा गया कपड़े गले के मेरे न हों आब-दीदा क्यूँँ मानिंद-ए-अब्र दीदा-ए-तर अब तो छा गया जाँ-सोज़ आह ओ नाला समझता नहीं हूँ मैं यक शो'ला मेरे दिल से उठा था जला गया वो मुझ से भागता ही फिरा किब्र-ओ-नाज़ से जूँ जूँ नियाज़ कर के मैं उस से लगा गया जोर-ए-सिपहर-ए-दूँ से बुरा हाल था बहुत मैं शर्म-ए-ना-कसी से ज़मीं में समा गया देखा जो राह जाते तबख़्तुर के साथ उसे फिर मुझ शिकस्ता-पास न इक-दम रहा गया बैठा तो बोरिए के तईं सर पे रख के 'मीर' सफ़ किस अदब से हम फ़ुक़रा की उठा गया

Meer Taqi Meer

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यारो मुझे मुआ'फ़ रखो मैं नशे में हूँ अब दो तो जाम ख़ाली ही दो मैं नशे में हूँ एक एक क़ुर्त दौर में यूँँ ही मुझे भी दो जाम-ए-शराब पुर न करो मैं नशे में हूँ मस्ती से दरहमी है मिरी गुफ़्तुगू के बीच जो चाहो तुम भी मुझ को कहो मैं नशे में हूँ या हाथों हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ मा'ज़ूर हूँ जो पाँव मिरा बे-तरह पड़े तुम सरगिराँ तो मुझ से न हो मैं नशे में हूँ भागी नमाज़-ए-जुमा तो जाती नहीं है कुछ चलता हूँ मैं भी टुक तो रहो मैं नशे में हूँ नाज़ुक-मिज़ाज आप क़यामत हैं 'मीर' जी जूँ शीशा मेरे मुँह न लगो मैं नशे में हूँ

Meer Taqi Meer

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बू कि हो सू-ए-बाग़ निकले है बाव से इक दिमाग़ निकले है है जो अंधेर शहर में ख़ुर्शीद दिन को ले कर चराग़ निकले है चोब-कारी ही से रहेगा शैख़ अब तो ले कर चुमाग़ निकले है दे है जुम्बिश जो वाँ की ख़ाक को बाव जिगर दाग़ दाग़ निकले है हर सहर हादिसा मिरी ख़ातिर भर के ख़ूँ का अयाग़ निकले है उस गली की ज़मीन-ए-तफ़्ता से दिल-जलों का सुराग़ निकले है शायद उस ज़ुल्फ़ से लगी है 'मीर' बाव में इक दिमाग़ निकले है

Meer Taqi Meer

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