ghazalKuch Alfaaz

देख तो दिल कि जाँ से उठता है ये धुआँ सा कहाँ से उठता है गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक शो'ला इक सुब्ह यां से उठता है ख़ाना-ए-दिल से ज़ीनहार न जा कोई ऐसे मकाँ से उठता है नाला सर खींचता है जब मेरा शोर इक आ समाँ से उठता है लड़ती है उस की चश्म-ए-शोख़ जहाँ एक आशोब वां से उठता है सुध ले घर की भी शोला-ए-आवाज़ दूद कुछ आशियाँ से उठता है बैठने कौन दे है फिर उस को जो तिरे आस्तां से उठता है यूँ उठे आह उस गली से हम जैसे कोई जहाँ से उठता है इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़ रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़ मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ'' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ

Meer Taqi Meer

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मक्का गया मदीना गया कर्बला गया जैसा गया था वैसा ही चल फिर के आ गया देखा हो कुछ उस आमद-ओ-शुद में तो मैं कहूँ ख़ुद गुम हुआ हूँ बात की तह अब जो पा गया कपड़े गले के मेरे न हों आब-दीदा क्यूँँ मानिंद-ए-अब्र दीदा-ए-तर अब तो छा गया जाँ-सोज़ आह ओ नाला समझता नहीं हूँ मैं यक शो'ला मेरे दिल से उठा था जला गया वो मुझ से भागता ही फिरा किब्र-ओ-नाज़ से जूँ जूँ नियाज़ कर के मैं उस से लगा गया जोर-ए-सिपहर-ए-दूँ से बुरा हाल था बहुत मैं शर्म-ए-ना-कसी से ज़मीं में समा गया देखा जो राह जाते तबख़्तुर के साथ उसे फिर मुझ शिकस्ता-पास न इक-दम रहा गया बैठा तो बोरिए के तईं सर पे रख के 'मीर' सफ़ किस अदब से हम फ़ुक़रा की उठा गया

Meer Taqi Meer

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मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिला जा मिस्र में हुआ था पाकीज़ा गौहरों की इज़्ज़त नहीं वतन में दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की तब दर्द है हमारे ऐ 'मीर' हर सुख़न में

Meer Taqi Meer

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तंग आए हैं दिल उस जी से उठा बैठेंगे भूखों मरते हैं कुछ अब यार भी खा बैठेंगे अब के बिगड़ेगी अगर उन से तो इस शहर से जा कसो वीराने में तकिया ही बना बैठेंगे मा'रका गर्म तो टक होने दो ख़ूँ-रेज़ी का पहले तलवार के नीचे हमीं जा बैठेंगे होगा ऐसा भी कोई रोज़ कि मज्लिस से कभू हम तो एक-आध घड़ी उठ के जुदा बैठेंगे जा न इज़हार-ए-मोहब्बत पे हवसनाकों की वक़्त के वक़्त ये सब मुँह को छुपा बैठेंगे देखें वो ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद कहाँ जाता है अब सर-ए-राह दम-ए-सुब्ह से आ बैठेंगे भीड़ टलती ही नहीं आगे से उस ज़ालिम के गर्दनें यार किसी रोज़ कटा बैठेंगे कब तलक गलियों में सौदाई से फिरते रहिए दिल को उस ज़ुल्फ़-ए-मुसलसल से लगा बैठेंगे शोला-अफ़्शाँ अगर ऐसी ही रही आह तो 'मीर' घर को हम अपने कसो रात जला बैठेंगे

Meer Taqi Meer

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देखेगा जो तुझ रो को सो हैरान रहेगा वाबस्ता तिरे मू का परेशान रहेगा वा'दा तो किया इस से दम-ए-सुब्ह का लेकिन उस दम तईं मुझ में भी अगर जान रहेगा मुनइ'म ने बना ज़ुल्म की रख घर तो बनाया पर आप कोई रात ही मेहमान रहेगा छूटूँ कहीं ईज़ा से लगा एक ही जल्लाद ता-हश्र मिरे सर पे ये एहसान रहेगा चिमटे रहेंगे दश्त-ए-मोहब्बत में सर-ओ-तेग़ महशर तईं ख़ाली न ये मैदान रहेगा जाने का नहीं शोर सुख़न का मिरे हरगिज़ ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा दिल देने की ऐसी हरकत उन ने नहीं की जब तक जियेगा 'मीर' पशेमान रहेगा

Meer Taqi Meer

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