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dil ke suune sahn men gunji aahat kis ke paanv ki dhup-bhare sannate men avaz suni hai chhanv ki ik manzar men saare manzar pas-manzar ho jaane hain ik dariya men mil jaani hain lahren sab dariyaon ki dasht-navardi aur hijrat se apna gahra rishta hai apni mitti men shamil hai mitti kuchh sahraon ki barish ki bundon se ban men tan men ek bahar aai ghar ghar gaae giit gagan ne gaunjin galiyan gaanv ki subh savere nange paanv ghaas pe chalna aisa hai jaise baap ka pahla bosa qurbat jaise maaon ki ik jaisa ehsas lahu men jiita jagta rahta hai ek udasi de jaati hai dastak roz havaon ki sinon aur zaminon ka ab manzar-nama badlega har su kasrat ho jaani hai phulon aur duaon ki dil ke sune sahn mein gunji aahat kis ke panw ki dhup-bhare sannate mein aawaz suni hai chhanw ki ek manzar mein sare manzar pas-manzar ho jaane hain ek dariya mein mil jaani hain lahren sab dariyaon ki dasht-nawardi aur hijrat se apna gahra rishta hai apni mitti mein shamil hai mitti kuchh sahraon ki barish ki bundon se ban mein tan mein ek bahaar aai ghar ghar gae git gagan ne gaunjin galiyan ganw ki subh sawere nange panw ghas pe chalna aisa hai jaise bap ka pahla bosa qurbat jaise maon ki ek jaisa ehsas lahu mein jita jagta rahta hai ek udasi de jati hai dastak roz hawaon ki sinon aur zaminon ka ab manzar-nama badlega har su kasrat ho jaani hai phulon aur duaon ki

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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दिल के सूने सहन में गूँजी आहट किस के पाँव की धूप-भरे सन्नाटे में आवाज़ सुनी है छाँव की इक मंज़र में सारे मंज़र पस-मंज़र हो जाने हैं इक दरिया में मिल जानी हैं लहरें सब दरियाओं की दश्त-नवर्दी और हिजरत से अपना गहरा रिश्ता है अपनी मिट्टी में शामिल है मिट्टी कुछ सहराओं की बारिश की बूँदों से बन में तन में एक बहार आई घर घर गाए गीत गगन ने गूँजीं गलियाँ गाँव की सुब्ह सवेरे नंगे पाँव घास पे चलना ऐसा है जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माँओं की इक जैसा एहसास लहू में जीता जागता रहता है एक उदासी दे जाती है दस्तक रोज़ हवाओं की सीनों और ज़मीनों का अब मंज़र-नामा बदलेगा हर सू कसरत हो जानी है फूलों और दु'आओं की

Hammad Niyazi

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